ग्रेटर नोएडा के बहुचर्चित बिसाहाड़ा अखलाक लिंचिंग केस में अदालत ने एक बड़ा और साफ संदेश देने वाला फैसला सुनाया है। सूरजपुर स्थित जिला अदालत ने आरोपियों के खिलाफ दर्ज मुकदमा वापस लेने को लेकर यूपी सरकार की ओर से दाखिल याचिका को खारिज कर दिया है। इस फैसले के साथ ही मामले में आरोपियों को राहत दिलाने की कोशिशों पर फिलहाल पूरी तरह से विराम लग गया है। अदालत ने साफ कर दिया कि केस को बीच रास्ते में खत्म करने की सरकारी कोशिश कानूनी कसौटी पर खरी नहीं उतरती।
याचिका को बताया आधारहीन
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने सरकार की ओर से केस वापस लेने का पक्ष रखा, लेकिन अदालत इससे संतुष्ट नहीं हुई। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिका में ऐसा कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है, जिसके दम पर इतने गंभीर मामले को वापस लिया जा सके। अदालत ने इसे महत्वहीन और कमजोर दलीलों वाली अर्जी मानते हुए खारिज कर दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि इस फैसले का मुकदमे की आगे की सुनवाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा और न्यायिक प्रक्रिया अपने तय रास्ते पर जारी रहेगी।
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देशभर में गूंजा था बिसाहाड़ा मामला
बिसाहाड़ा अखलाक हत्याकांड साल 2015 में पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था। यह मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं रहा, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस का बड़ा केंद्र बन गया। वर्षों से यह केस अदालत में लंबित है और बीच-बीच में इसे लेकर कई तरह की कानूनी और राजनीतिक गतिविधियां सामने आती रही हैं। सरकार द्वारा केस वापस लेने की कोशिश को भी इसी कड़ी में देखा जा रहा था, लेकिन अदालत के फैसले ने साफ कर दिया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में कानून से समझौता नहीं किया जा सकता।
क्या था अखलाक लिंचिंग का पूरा मामला
28 सितंबर 2015 की रात उत्तर प्रदेश के दादरी क्षेत्र के बिसाहड़ा गांव में हालात अचानक बिगड़ गए थे। आरोप लगाया गया कि गांव में गाय का बछड़ा गायब हुआ था और शक अखलाक के परिवार पर गया। इसी आरोप को लेकर ग्रामीणों की भीड़ अखलाक के घर पहुंची और देखते ही देखते मामला हिंसक हो गया। भीड़ ने कथित आरोपों के आधार पर मोहम्मद अखलाक की पीट-पीट कर हत्या कर दी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। अब अदालत के ताजा फैसले के बाद एक बार फिर यह मामला सुर्खियों में है और निगाहें आगे की सुनवाई पर टिकी हैं।