
उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से जातीय समीकरणों और हिंदुत्व की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती रही है. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए इसमें सबसे अहम भूमिका निभाई थी पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने. उन्हें यूपी की सियासत में वह चेहरा माना जाता है जिसने पार्टी को ऊंची जातियों की छवि से बाहर निकालकर पिछड़े वर्गों तक पहुंचाया. साथ ही राम मंदिर आंदोलन के जरिए हिंदुत्व की राजनीति को भी धार दी. अब बीजेपी कल्याण सिंह की पुण्यतिथि को एक बड़े राजनीतिक मौके में बदलने की कोशिश कर रही है. गुरुवार को उनकी चौथी पुण्यतिथि को पार्टी ने “हिंदू गौरव दिवस” के रूप में मनाने का फैसला किया है. इस कार्यक्रम को लेकर बीजेपी का इरादा साफ है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हिंदुत्व और ओबीसी (विशेषकर लोधी समाज) को साधने का मजबूत संदेश देना.
अलीगढ़ में होगा बड़ा कार्यक्रम
कल्याण सिंह की पुण्यतिथि पर अलीगढ़ में बीजेपी का भव्य कार्यक्रम आयोजित हो रहा है. इसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक, केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी, संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह समेत कई दिग्गज नेता शामिल होंगे. योगी सरकार के करीब दो दर्जन मंत्री भी अलीगढ़ पहुंचकर श्रद्धांजलि देंगे. करीब दो घंटे तक सीएम योगी और बीजेपी के बड़े नेता अलीगढ़ में रहेंगे और कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि देने के बहाने 2027 के चुनावी अभियान का पश्चिम यूपी से आगाज करेंगे.
कल्याण सिंह की राजनीतिक पहचान
कल्याण सिंह सिर्फ बीजेपी के नेता नहीं थे, बल्कि उन्हें राम मंदिर आंदोलन का नायक माना जाता है. 1992 में जब वो यूपी के मुख्यमंत्री थे, तभी अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ था. इसके बाद उन्होंने अपनी सत्ता की कुर्सी तक गंवा दी, लेकिन हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उनकी पहचान बन गई. वो अकेले ऐसे बीजेपी नेता रहे जिन्होंने राम मंदिर के लिए जेल की सजा भी काटी. यही वजह है कि आज भी उन्हें हिंदुत्व का प्रखर चेहरा और रामभक्त नेता माना जाता है. कल्याण सिंह ओबीसी की लोधी जाति से आते थे. यूपी में लोध समाज का वोट बैंक निर्णायक माना जाता है. इसी वजह से बीजेपी को उनसे हमेशा बड़ा राजनीतिक फायदा मिला. उनके चलते लोधी समाज बीजेपी का परंपरागत वोटर बन गया.
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2027 से पहले बीजेपी की रणनीति
बीजेपी जानती है कि यूपी की राजनीति में जीत हासिल करने के लिए ओबीसी मतदाताओं को अपने साथ रखना जरूरी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को ओबीसी मतदाताओं का खासा नुकसान हुआ था. समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले से गैर-यादव ओबीसी और दलित वोटरों को जोड़ने में सफलता पाई. यही कारण है कि बीजेपी अब कल्याण सिंह के नाम और छवि को सामने रखकर ओबीसी वोटरों को दोबारा अपने साथ जोड़ना चाहती है. खासकर लोधी समाज को, जो पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड के कई जिलों में निर्णायक भूमिका निभाता है.
लोधी समाज और बीजेपी का रिश्ता
यूपी में करीब 3 फीसदी लोधी समुदाय है, लेकिन इनकी पकड़ 23 जिलों में बेहद मजबूत है. इनमें अलीगढ़, कासगंज, बदायूं, आंवला, संभल, मैनपुरी, रामपुर, फर्रुखाबाद, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर जैसे इलाके शामिल हैं. इन जिलों में लोधी वोटर 5 से 10 फीसदी तक हैं, जो नतीजों को बदलने की ताकत रखते हैं. कल्याण सिंह ने ही सबसे पहले लोधी समाज को बीजेपी से जोड़कर गैर-यादव ओबीसी को एकजुट किया था. उनकी बदौलत ही बीजेपी ने खुद को सिर्फ सवर्णों की पार्टी की छवि से बाहर निकाला. आज भी बीजेपी ने लोधी समाज के कई नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां दी हैं. कल्याण सिंह के पौत्र संदीप सिंह योगी सरकार में मंत्री हैं. राज्यसभा और विधानसभा में भी लोधी नेताओं को प्रतिनिधित्व दिया गया है. लेकिन 2024 के चुनाव में लोधी समाज की बीजेपी से नाराजगी की खबरें सामने आई थीं. ऐसे में पार्टी फिर से उन्हें साधने में जुट गई है.
सपा और कांग्रेस की चुनौती
सपा और कांग्रेस मिलकर बीजेपी को चुनौती देने के लिए ओबीसी-दलित एकता का नैरेटिव गढ़ रही हैं. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का पीडीए फॉर्मूला और कांग्रेस के राहुल गांधी का आरक्षण-समर्थक एजेंडा ओबीसी और दलित मतदाताओं को बीजेपी से दूर ले गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी पश्चिम यूपी की कई सीटें हार गई—मुजफ्फरनगर, कैराना, सहारनपुर, मुरादाबाद, नगीना. इसके अलावा लोधी समाज के प्रभाव वाले कई सीटें भी उसके हाथ से निकल गईं. बीजेपी अब इस नुकसान की भरपाई 2027 से पहले करना चाहती है. कल्याण सिंह की पुण्यतिथि को ‘हिंदू गौरव दिवस’ के रूप में मनाना इसी रणनीति का हिस्सा है.
हिंदुत्व और ओबीसी समीकरण—दोनों पर फोकस
बीजेपी की रणनीति साफ है. वो हिंदुत्व का एजेंडा तेज करना चाहती है. कल्याण सिंह की छवि को हिंदुत्व के चेहरे के रूप में भुनाकर पार्टी 2027 के लिए माहौल तैयार करना चाहती है. इसके साथ ही ओबीसी वोट बैंक साधना भी उसकी कोशिश है. खासकर लोधी समाज जो पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड में निर्णायक भूमिका निभाता है. इसके अलावा बीजेपी अब सपा की पीडीए राजनीति को काउंटर करना चाहती है. बीजेपी हिंदुत्व और ओबीसी नेताओं के सहारे गैर-यादव ओबीसी वोटरों को अपने पाले में रखना चाहती है.
कल्याण सिंह की विरासत और बीजेपी का भविष्य
कल्याण सिंह की छवि आज भी बीजेपी के लिए बेहद अहम है. वो सिर्फ लोधी समाज के नेता नहीं थे, बल्कि यूपी की राजनीति में उन्हें गुड गवर्नेंस और कड़े फैसले लेने वाले सीएम के तौर पर भी याद किया जाता है. बीजेपी में आज उनके कद का कोई ओबीसी नेता नहीं है. ऐसे में पार्टी उनकी छवि और विरासत को ही आगे बढ़ाकर ओबीसी मतदाताओं को संदेश देना चाहती है कि वह अभी भी कल्याण सिंह की सोच और राजनीति पर चल रही है.
कल्याण सिंह की पुण्यतिथि को “हिंदू गौरव दिवस” के रूप में मनाना सिर्फ श्रद्धांजलि का कार्यक्रम नहीं है. यह बीजेपी का 2027 विधानसभा चुनाव से पहले का बड़ा राजनीतिक दांव है. पार्टी एक तीर से दो निशाने साधना चाहती है. पहला हिंदुत्व की राजनीति को दोबारा धार देना. दूसरा लोधी समाज और गैर-यादव ओबीसी को मजबूती से अपने साथ जोड़ना. अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या सीएम योगी और बीजेपी का यह दांव 2027 में उन्हें सत्ता की हैट्रिक दिलाने में कामयाब होगा या सपा और कांग्रेस की पीडीए राजनीति इस रणनीति पर भारी पड़ जाएगी.