पाकिस्तान में डिजिटल अपराधों के नाम पर ईशनिंदा के आरोपों में तेजी देखी जा रही है। मानवाधिकार संगठनों ने इसे अब एक तरह का “ईशनिंदा बिजनेस” करार दिया। इसमें फर्जी सबूत, डिजिटल रूप से छेड़छाड़ किए गए स्क्रीनशॉट और झूठे गवाहों के जरिए लोगों को फंसाया जा रहा है। हाल ही में दिसंबर में लाहौर हाईकोर्ट की रावलपिंडी बेंच ने एक डिजिटल ईशनिंदा मामले में छह लोगों को बरी किया। इन्हें पहले उम्रकैद या मौत की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों और कथित ऑनलाइन सामग्री के बीच किसी तरह के संबंध साबित नहीं कर सका। यह जानकारी सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट की रिपोर्ट में दी गई। इसे नायला मोहम्मद और सेसिल शेन चौधरी ने तैयार किया है।
ईशनिंदा कारोबार पर भी चिंता जताई
अदालत ने अपने फैसले में बढ़ते “ईशनिंदा कारोबार” पर भी चिंता जताई और कहा कि अब अपुष्ट या गढ़े हुए डिजिटल कंटेंट के जरिए लोगों को ऐसे मामलों में फंसाया जा रहा है, जिनमें मौत की सजा तक का प्रावधान है। रिपोर्ट के अनुसार, ज़्यादातर निशाना धार्मिक अल्पसंख्यकों और गरीब तबके के लोग बनते हैं, जिन पर बिचौलियों के जरिये पैसे देने का दबाव बनाया जाता है ताकि केस रफा-दफा हो सके या समझौता कराया जा सके।
अपमान पर मौत की सजा अनिवार्य
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की ईशनिंदा कानून व्यवस्था, खासकर पाकिस्तान पीनल कोड की धारा 295-सी, जो पैगंबर मोहम्मद के अपमान पर मौत की सजा अनिवार्य करती है, ने एक बेहद खतरनाक माहौल बना दिया है। इसमें महज आरोप लगते ही गिरफ्तारी, भीड़ की हिंसा या न्यायेतर हत्या तक हो जाती है। आंकड़ों के मुताबिक 1994 से 2024 के बीच कम से कम 104 लोगों की ईशनिंदा के आरोपों के बाद न्यायेतर हत्या हुई है।
अधिकारियों की भी मिलीभगत सामने आई
मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इन मामलों में धार्मिक संगठनों से जुड़े तत्वों के साथ-साथ कुछ मामलों में फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एफआईए) के अधिकारियों की भी मिलीभगत सामने आई है। कई बार बिना फॉरेंसिक जांच के ही शिकायत दर्ज कर ली जाती है और सोशल मीडिया स्क्रीनशॉट्स को सीधे सबूत मान लिया जाता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) जैसे कट्टरपंथी संगठनों से जुड़े ऑनलाइन समूह डिजिटल ईशनिंदा मामलों को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।