उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल की शुरुआत एक साधारण सी डिनर पार्टी से हुई, लेकिन इसके असर ने बीजेपी के भीतर गहरी बेचैनी पैदा कर दी। लखनऊ में ब्राह्मण विधायकों की अनौपचारिक बैठक सामने आते ही पार्टी संगठन असहज हो गया। सवाल यह नहीं उठा कि विधायक मिले क्यों, बल्कि यह उठा कि इस तरह का जुटान किस संदेश की ओर इशारा करता है। संगठन को आशंका हुई कि यह बैठक जातिगत संकेत दे रही है। इसके बाद बीजेपी के भीतर दो साफ धड़े नजर आने लगे। एक पक्ष इसे सामान्य सामाजिक मुलाकात बता रहा है, जबकि दूसरा इसे अनुशासन का उल्लंघन मान रहा है। यही से विवाद ने सियासी रंग पकड़ लिया।
केशव मौर्य का बयान और बदला हुआ माहौल
इसी विवाद के बीच डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का बयान सामने आया, जिसने पूरे मामले की दिशा बदल दी। केशव मौर्य ने दो टूक कहा कि बीजेपी में न ब्राह्मणवाद है और न ठाकुरवाद, यहां सिर्फ बीजेपीवाद चलता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई विधायक डिनर या जन्मदिन पर मिलता है, तो उसे जातिगत राजनीति कहना गलत है। साथ ही यह चेतावनी भी दी कि जो लोग अलग धारा बनाने की कोशिश करेंगे, उनका राजनीतिक भविष्य सुरक्षित नहीं होगा। इस बयान के बाद पार्टी के भीतर हलचल और तेज हो गई। कुछ नेताओं ने इसे सख्त संदेश माना, तो कुछ ने इसे विवाद शांत करने की कोशिश बताया।
संगठन की चेतावनी और नेताओं का विरोधाभास
बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए ब्राह्मण विधायकों को दो बार चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसी बैठक न हो। यही बात ब्राह्मण विधायकों को सबसे ज्यादा चुभ गई। पार्टी के भीतर यह सवाल उठने लगा कि जब पहले क्षत्रिय समाज से जुड़ी बैठक हुई थी, तब कोई चेतावनी क्यों नहीं दी गई। इस बीच मंत्री धर्मवीर प्रजापति और सुनील शर्मा ने कहा कि बैठक को जातिवाद से नहीं जोड़ना चाहिए। पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने भी बैठक का समर्थन किया। लेकिन इन बयानों से स्थिति साफ होने के बजाय और उलझ गई।
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अखिलेश का हमला और 2027 की आहट
इसी मौके पर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सीधा सियासी दांव खेल दिया। उन्होंने कहा कि जिन्हें अनुशासनहीन बताकर अपमानित किया जा रहा है, वही लोग सत्ता के अहंकार को तोड़ेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जो सत्ता सम्मान नहीं दे सकती, उसे अपमान करने का अधिकार भी नहीं है। कांग्रेस भी इस मुद्दे को भुनाने में जुट गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विवाद सिर्फ बैठक तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता में हिस्सेदारी और भविष्य की रणनीति से जुड़ा है। यूपी में 42 ब्राह्मण विधायक और 110 से ज्यादा सीटों पर असर रखने वाला ब्राह्मण वोट बैंक बीजेपी के लिए अहम है। ऐसे में यह विवाद 2027 से पहले बड़ी चुनौती बन सकता है।