उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों ब्राह्मण सियासत की चर्चा जोरों पर है। पंचायत चुनाव से लेकर दो हजार सत्ताइस की तैयारी तक हर दल नए समीकरण बनाने में जुटा है। ऐसे माहौल में जब पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के आयोजन में एक साथ कई दबदबे वाले चेहरे नजर आए तो सियासी हलचल तेज हो गई। यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था बल्कि ताकत और संकेत दोनों का प्रदर्शन माना गया। तस्वीरें सामने आते ही लखनऊ से दिल्ली तक सवाल उठने लगे कि आखिर इस मंच के जरिए क्या संदेश दिया गया है।
एक मंच पर दिखे चार प्रभावशाली चेहरे
इस आयोजन में धनंजय सिंह, बृजेश सिंह, सुशील सिंह और खुद बृजभूषण शरण सिंह एक साथ मंच पर दिखे। ये ऐसे नाम हैं जिनका असर पूर्वांचल की राजनीति में लंबे समय से रहा है। जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ सामाजिक कार्यक्रम नहीं बल्कि एक सोचा समझा सियासी संदेश था। मंच की सजावट, नेताओं की मुस्कान और आपसी सहजता यह दिखा रही थी कि पुराने खिलाड़ी अभी भी मैदान में हैं और जरूरत पड़ने पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं।
पूर्वांचल में अब भी असर रखता है दबदबा
पूर्वांचल वह इलाका है जहां आज भी जाति, समाज और व्यक्तिगत पकड़ राजनीति में अहम भूमिका निभाती है। चाहे कानून व्यवस्था को लेकर नए दावे किए जाएं या नए चेहरों को आगे लाया जाए, लेकिन कुछ नाम आज भी वोटरों के बीच असर रखते हैं। इन चार नेताओं का एक साथ दिखना इसी सच्चाई की याद दिलाता है। यही वजह है कि इनके एक मंच पर आते ही सपा, बसपा और कांग्रेस के साथ साथ भाजपा के भीतर भी चर्चाएं तेज हो गईं।
सबसे बड़ा सवाल, राजा भैया क्यों नहीं आए
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा उस चेहरे की है जो मंच पर नजर नहीं आया। जब बाहुबली राजनीति की बात होती है तो राजा भैया का नाम अपने आप सामने आता है। लेकिन इस बार वह पूरी तरह नदारद रहे। सवाल उठने लगे कि क्या यह महज संयोग था या जानबूझकर बनाई गई दूरी। उनकी अनुपस्थिति ने इस आयोजन को और ज्यादा सियासी बना दिया।
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राजा भैया की अलग राजनीतिक चाल
राजा भैया की राजनीति हमेशा से अलग मानी जाती रही है। उनका वोट बैंक सीमित जरूर है लेकिन बेहद वफादार माना जाता है। वे खुले तौर पर सामूहिक शक्ति प्रदर्शन से दूरी रखते आए हैं। सत्ता से उनका रिश्ता टकराव से ज्यादा तालमेल वाला रहा है। माना जा रहा है कि ऐसे मंच पर जाना जहां शक्ति प्रदर्शन का संदेश साफ हो, उनकी स्वतंत्र पहचान को कमजोर कर सकता था। इसलिए उन्होंने खुद को अलग रखा।
क्या बन रहा है नया सियासी समीकरण
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या पूर्वांचल में पुराने नेता नए समीकरण के साथ लौटने की तैयारी में हैं। क्या यह किसी बड़े चुनाव से पहले की जमीन तैयार करने की कवायद है। और क्या राजा भैया जानबूझकर इस सामूहिक पावर गेम से दूर रहकर अपनी अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं। बृजभूषण के मंच से उठी यह हलचल बता रही है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में तस्वीरें सिर्फ तस्वीरें नहीं होतीं। यहां मौजूदगी जितना संदेश देती है, उतनी ही मजबूत भाषा अनुपस्थिति भी बोलती है। आने वाले समय में यह तस्वीर किस दिशा में ले जाती है, यही सबसे बड़ा सवाल है।