UP politics: उत्तर प्रदेश के इटावा में कथावाचक की चोटी काटने और बदसलूकी करने की घटना को जिस तरह से तूल दिया जा रहा है। वह ब्राह्मण बनाम यादव की राजनीति के सिवाय कुछ नही है। आज के समय में ब्राह्मणों मे इतनी दम नही कि वह किसी यादव का सिर मुंडवाकर उसे नीचा दिखाएं। इसके पीछे कहीं न कहीं राजनीतिक कारण है। अगर ब्राह्मण ओर यादव के हैसियत की बात की जाए तो ब्राह्मण समाज इतना ताकतवर नहीं है दूसरे यादव समाज प्रदेश अच्छी खासी पहुंच रखने वाली जाति है। यादव समाजवादी पार्टी के सत्ता में न होने पर भी रौब जमाते हुए नजर आ जाएंगे ।
प्रदेश में ब्राह्मण की स्थिति
प्रदेश में ब्राह्मण समाज को लेकर राजनीति बहुत गहरी चल रही है। लगता है जब से प्रदेश योगी आदित्यनाथ सत्ता में आए हैं तब से ठाकुरों का वर्चस्व बढ़ गया है और ब्राह्मणों का उत्पीड़न हो रहा है। अब सवाल ये है कि ब्राह्मण और यादवों को लड़ाने की कोशिश कौन कर रहा है।कुल मिलाकर यूपी की राजनीति में आज भी ब्राह्मण अहम रोल निभाते हैं। एक तरफ ब्राह्मणों के हाथ से सत्ता दूर होते जा रहे है। तो वहीं दूसरी तरफ उनके वोट बैंक के लिए राजनीतिक दलों के बीच संघर्ष चल रहा है।
यूपी में ब्राह्मण वोट के प्रति राजनीति
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों राजनीति में हमेशा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यूपी में ब्राह्मण वोट करीब 8-12% हैं, जो लगभग 60-115 विधानसभा सीटों पर जीत के प्रभाव डालता है। अगर देखा जाए तो प्रदेश में राजनीतिक रूप ससबसे अधिक जागरूक ब्राह्मण समाज ही रहा है। कभी प्रदेश में ब्राह्मणों की राजनीति में सबसे अधिक ताकतवर जाति मानी जाती थी । प्रदेश में सबसे अधिक मुख्यमंत्री और मंत्री इसी जाति से आते थे। पर आज स्थिति बदल चुकी है। प्रदेश में चाहे समाजवादी पार्टी का शासन हो या बीजेपी का। ब्राह्मण हमेशा से ही दाव पर रहा हैं। पिछले कुछ वर्षों में, लगातार ब्राह्मणों को लुभाने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों ने नए तौर तरीके अपनाए हैं।