ब्राजील की राजनीति में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आलोचक माने जाने वाले लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा की चुनाव में जीत की खबर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से अहम मानी जा रही है। ब्राजील की स्वतंत्र विदेश नीति और अमेरिका के साथ उसके संबंधों को लेकर भी चर्चा तेज है। लूला का यह संदेश कि उनका देश किसी बाहरी ताकत के प्रभाव में नहीं चलेगा, उनकी राजनीतिक सोच और राष्ट्रीय संप्रभुता पर जोर को दर्शाता है।
दूसरे दौर की वोटिंग में पलटी बाजी, फ्लेवियो बोल्सोनारो को हराया
लूला डा सिल्वा ने 25 अक्टूबर 2026 को हुए दूसरे दौर के मतदान में दक्षिणपंथी उम्मीदवार फ्लेवियो बोल्सोनारो को शिकस्त दी। आधिकारिक चुनावी नतीजों के अनुसार, लूला को करीब 51.8 प्रतिशत वोट मिले, जबकि फ्लेवियो बोल्सोनारो को लगभग 48.2 प्रतिशत मत हासिल हुए। पहले दौर में फ्लेवियो ने बढ़त बनाई थी, लेकिन दूसरे दौर में लूला ने जोरदार वापसी करते हुए जीत दर्ज की। यह मुकाबला बेहद करीबी रहा और दोनों उम्मीदवारों के बीच चार मिलियन से अधिक वोटों का अंतर रहा।
चौथी बार राष्ट्रपति बनने का बनाया रिकॉर्ड
इस जीत के साथ लूला डा सिल्वा ने ब्राजील की राजनीति में एक नया इतिहास रच दिया है। वह चौथी बार राष्ट्रपति पद संभालने जा रहे हैं, हालांकि उनके कार्यकाल लगातार नहीं रहे हैं। इससे पहले वह 2003 से 2010 तक दो कार्यकाल राष्ट्रपति रह चुके हैं और 2023 में दोबारा सत्ता में लौटे थे। इस बार का चुनाव उनके लिए आसान नहीं था। महंगाई, अपराध, भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों और आर्थिक चुनौतियों के बीच उन्होंने मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए व्यापक प्रचार अभियान चलाया। दूसरे दौर में मिली जीत ने उनकी राजनीतिक पकड़ को फिर मजबूत किया है।
अमेरिका के साथ संबंधों पर टिकी दुनिया की नजर
लूला की जीत का असर ब्राजील और अमेरिका के रिश्तों पर भी पड़ सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और व्यापार शुल्क को लेकर लूला पहले भी सवाल उठाते रहे हैं। उनका जोर इस बात पर रहा है कि ब्राजील को अपनी विदेश नीति, व्यापार और आर्थिक फैसले स्वतंत्र रूप से लेने चाहिए। ऐसे में उनके नए कार्यकाल में वॉशिंगटन के साथ व्यापारिक बातचीत और कूटनीतिक संबंधों की दिशा महत्वपूर्ण होगी। हालांकि, चुनावी जीत का अर्थ यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच टकराव निश्चित है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दोनों सरकारें मतभेदों के बावजूद सहयोग का रास्ता कैसे निकालती हैं।