BRICS Local Currency : BRICS के विस्तार के साथ सदस्य और साझेदार देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार निपटाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। एक विश्लेषण के मुताबिक, BRICS+ के बड़े नेटवर्क में भारत का करीब 39.5 प्रतिशत व्यापार स्थानीय मुद्रा में भुगतान की संभावित व्यवस्था के दायरे में आ सकता है। इसमें 10 सदस्य देश और 10 साझेदार अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं, जिन्होंने 2026 के नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया था। हालांकि, वास्तविक हिस्सेदारी भुगतान व्यवस्था, मुद्रा की उपलब्धता और दोनों पक्षों की सहमति पर निर्भर करेगी।
रूस और ईरान को सबसे बड़ा फायदा
स्थानीय मुद्रा में व्यापार के मामले में रूस और ईरान सबसे ज्यादा लाभ पाने वाले देशों में शामिल हो सकते हैं। विश्लेषण के अनुसार, रूस अपने BRICS+ साझेदारों के साथ करीब 61 प्रतिशत व्यापार स्थानीय मुद्राओं में निपटा सकता है। ईरान के लिए यह संभावित हिस्सा करीब 64 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। दोनों देशों के लिए यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय प्रमुख मुद्राओं पर निर्भरता कम करने का रास्ता खोल सकती है।
इथियोपिया-इंडोनेशिया भी आगे
BRICS+ के विस्तार का फायदा इथियोपिया और इंडोनेशिया को भी काफी मिल सकता है। इथियोपिया का करीब 48.8 प्रतिशत और इंडोनेशिया का 48.7 प्रतिशत व्यापार संभावित रूप से स्थानीय मुद्रा भुगतान व्यवस्था के दायरे में आ सकता है। इसका मतलब है कि विस्तारित नेटवर्क इन देशों के लिए सीमा पार व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल की गुंजाइश बढ़ा सकता है।
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भारत का हिस्सा 39.5 प्रतिशत तक
भारत के लिए भी BRICS+ का विस्तार महत्वपूर्ण है। मूल BRICS ढांचे में भारत के करीब 22.4 प्रतिशत व्यापार को स्थानीय मुद्रा निपटान व्यवस्था के दायरे में लाया जा सकता था। विस्तारित BRICS समूह में यह हिस्सेदारी बढ़कर 33.8 प्रतिशत हो गई। वहीं BRICS+ के बड़े नेटवर्क को शामिल करने पर यह संभावित हिस्सा 39.5 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। यानी शुरुआती ढांचे की तुलना में भारत के लिए दायरा काफी बढ़ गया है।
डॉलर निर्भरता घटाने की कोशिश
स्थानीय मुद्राओं में व्यापार का एक बड़ा फायदा लेनदेन की लागत घटाना हो सकता है। दो देशों के बीच सीधे स्थानीय मुद्रा में भुगतान होने पर तीसरी मुद्रा के जरिए रकम बदलने की जरूरत कम हो सकती है। इससे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं में उतार-चढ़ाव का असर भी कुछ हद तक कम किया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए पर्याप्त मुद्रा तरलता, आसान विनिमय व्यवस्था और निर्यातकों तथा आयातकों की सहमति जरूरी होगी।
चीन और UAE को सीमित फायदा
BRICS+ के विस्तार से सभी देशों को एक जैसा फायदा नहीं मिलेगा। चीन के लिए स्थानीय मुद्रा भुगतान का संभावित दायरा करीब 28 प्रतिशत बताया गया है। वहीं संयुक्त अरब अमीरात के लिए यह हिस्सा करीब 21 प्रतिशत रह सकता है। भारत के लिए रूस के साथ व्यापार का बड़ा हिस्सा पहले से ही स्थानीय मुद्राओं में निपटाया जाता रहा है। ऐसे में BRICS+ का विस्तारित नेटवर्क भारत को नए साझेदारों के साथ ऐसी व्यवस्था बढ़ाने का अतिरिक्त अवसर दे सकता है।