अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान से जुड़े नए प्रतिबंध कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस कानून के तहत अमेरिका को उन देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है जो बड़ी मात्रा में रूसी तेल और गैस खरीदते हैं। भारत भी उन देशों में शामिल है जो रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करते हैं। ऐसे में इस फैसले ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है।
रूसी तेल खरीद पर नजर
नए कानून का मुख्य फोकस उन देशों पर है जो रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखे हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत अपनी कुल तेल जरूरत का 40% से अधिक हिस्सा रूस से खरीद रहा है। हाल के महीनों में रूस से तेल आयात लगातार ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। यही वजह है कि भारत का नाम उन देशों में लिया जा रहा है जिन पर भविष्य में अतिरिक्त टैरिफ लगाने पर विचार किया जा सकता है।
महंगा हो सकता है तेल का आयात
अगर भारत को रूसी तेल की खरीद कम करनी पड़ती है और उसे दूसरे देशों से कच्चा तेल खरीदना पड़ता है, तो आयात लागत बढ़ सकती है। पश्चिम एशिया, अफ्रीका या अन्य बाजारों से तेल उपलब्ध तो है, लेकिन उसकी कीमत और परिवहन लागत ज्यादा हो सकती है। इससे देश का तेल आयात बिल बढ़ने की आशंका है और पेट्रोल-डीजल समेत कई क्षेत्रों पर दबाव देखने को मिल सकता है।
निर्यात पर भी पड़ सकता है असर
अगर अमेरिका भारत पर 100% टैरिफ लागू करता है, तो भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में काफी महंगे हो जाएंगे। इसका असर टेक्सटाइल, फार्मा, जेम्स-ज्वेलरी, इंजीनियरिंग उत्पाद, केमिकल्स और समुद्री उत्पादों जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है। महंगे होने की वजह से अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों के विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे भारतीय निर्यात प्रभावित हो सकता है।
भारत-अमेरिका व्यापार के लिए अहम समय
अमेरिका भारत का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है। हाल के आंकड़ों के अनुसार भारत का अमेरिका को निर्यात लगातार बढ़ रहा है। ऐसे समय में टैरिफ को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं पर भी असर डाल सकती है। व्यापार जगत की नजर अब इस बात पर है कि आगे अमेरिका इस कानून का इस्तेमाल किस तरह करता है।
फिलहाल फैसला ट्रंप के अधिकार में
कानून पर हस्ताक्षर होने के बाद अब अमेरिकी प्रशासन के पास संबंधित देशों पर टैरिफ लगाने का अधिकार है, लेकिन यह स्वतः लागू नहीं होता। आने वाले महीनों में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि स्थिति की समीक्षा करेंगे और उसके बाद आगे के कदम तय हो सकते हैं। फिलहाल भारत ने साफ संकेत दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा। ऐसे में आने वाले समय में इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच बातचीत और कूटनीतिक प्रयास अहम भूमिका निभा सकते हैं।