AR Rahman statement: ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान के एक हालिया इंटरव्यू ने देश में नई बहस को जन्म दे दिया है। रहमान ने बातचीत के दौरान कहा कि पिछले आठ वर्षों में उन्हें बॉलीवुड में पहले की तुलना में कम काम मिला है। साथ ही उन्होंने यह संकेत भी दिया कि सत्ता में बदलाव के बाद रचनात्मक माहौल पर उसका असर पड़ा है। इस बयान के सामने आते ही फिल्म इंडस्ट्री के साथ-साथ राजनीतिक गलियारों में भी चर्चाएं तेज हो गईं और मामला सियासी रंग लेने लगा।
विपक्ष का समर्थन
एआर रहमान के बयान पर विपक्षी दलों ने खुलकर समर्थन जताया है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि वे हमेशा से रहमान के संगीत के प्रशंसक रहे हैं। उन्होंने कहा कि रहमान के गाने रिलीज होते ही लोकप्रिय हो जाते थे और कला, संगीत व संस्कृति को किसी धर्म या भेदभाव के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। अखिलेश ने इसे रचनात्मक स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा बताया।
भेदभाव के आरोप खारिज
दूसरी ओर, सत्ताधारी दल बीजेपी के नेताओं ने इन आरोपों को सिरे से नकार दिया है। बिहार सरकार के मंत्री दिलीप जयसवाल ने कहा कि कुछ लोग बेवजह हर मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम से जोड़ देते हैं। उनके मुताबिक देश में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं है और सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ की नीति पर काम कर रही है। उन्होंने इसे व्यक्तिगत अनुभव करार दिया।
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कांग्रेस ने उठाए सवाल
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इस पूरे मामले को गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि अगर एक ऑस्कर विजेता कलाकार यह महसूस कर रहा है कि उसे काम नहीं मिल रहा, तो यह सोचने का विषय है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी कलाकार को धर्म के आधार पर अवसरों से वंचित किया जा रहा है, तो यह समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए चिंता का संकेत है।
बयान से बढ़ी बहस
एआर रहमान के बयान ने एक बार फिर रचनात्मक स्वतंत्रता, अवसरों की समानता और कला के सामाजिक माहौल पर बहस को हवा दे दी है। जहां एक पक्ष इसे व्यक्तिगत अनुभव मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ से जोड़कर देख रहा है। आने वाले दिनों में यह विवाद और किस दिशा में जाएगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।