
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना से लेकर आज तक के 100 वर्षों का सफर एक विचारधारा, एक जीवनशैली और एक राष्ट्र समर्पित साधना की कहानी है। यह केवल संगठन का इतिहास नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को जागृत करने का अभियान रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं इस विचारधारा से गहराई से जुड़े रहे हैं। उनके अनुभव, चिंतन और कार्यशैली में संघ के संस्कार स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं।
संघ: समाज सेवा से राष्ट्र निर्माण तक
संघ का मूल उद्देश्य केवल राजनीतिक या सांस्कृतिक आंदोलन चलाना नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण करना है। शाखाओं के माध्यम से संस्कारित नागरिकों का निर्माण करना, उनके भीतर राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और सेवा भाव भरना—यही इसकी रीढ़ है। मोदी जी स्वयं बचपन से संघ के स्वयंसेवक रहे हैं, और उन्होंने इस विचार को अपने जीवन में जिया है। उनके शब्दों में, संघ एक "जीवन जीने की शैली" है, न कि केवल एक संस्था।
#WATCH | Maharashtra | Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) members recite Sangh Prarthana as they gather to celebrate #VijayaDashami in Nagpur
— ANI (@ANI) October 2, 2025
RSS chief Mohan Bhagwat, Union Minister Nitin Gadkari, Maharashtra CM Devendra Fadnavis and other dignitaries are present.
Former… pic.twitter.com/FZxBlS975v
नरेंद्र मोदी की दृष्टि से संघ का महत्व
प्रधानमंत्री मोदी जब संघ के 100 वर्षों की यात्रा को देखते हैं, तो वे इसे केवल एक संस्थान की उपलब्धि नहीं मानते, बल्कि एक विचार की निरंतर विजय के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार, संघ ने हमेशा समय की पुकार को पहचाना और हर संकट में समाज के साथ खड़ा रहा—चाहे वह आपदा राहत हो, सामाजिक समरसता का अभियान हो, या राष्ट्रीय एकता की बात हो। मोदी जी के भाषणों और लेखों में संघ के प्रति उनका सम्मान और उसकी भूमिका का आकलन साफ झलकता है।
शताब्दी वर्ष: आत्ममंथन और नवचेतना का अवसर
संघ के 100 वर्ष केवल उत्सव का कारण नहीं हैं, बल्कि आत्ममंथन और नवचेतना का भी अवसर हैं। प्रधानमंत्री मोदी इस पड़ाव को "कर्तव्य पथ पर पुनः संकल्प का क्षण" मानते हैं। उनके अनुसार, आने वाला समय केवल संगठन के विस्तार का नहीं, बल्कि राष्ट्र की नई दिशा तय करने का है—जहां सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास के मंत्र को सामाजिक व्यवहार में उतारा जाए।