भारत के आम बजट 2026-27 में चाबहार पोर्ट के लिए फंडिंग न रखे जाने से नई भू-राजनीतिक बहस छिड़ गई है। हर साल करीब 100 करोड़ रुपये आवंटित करने की परंपरा टूटते ही ईरान ने इसे “निराशाजनक” बताया। सवाल उठ रहा है—क्या यह अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में लिया गया फैसला है या फिर एक सोची-समझी रणनीतिक चाल? चाबहार, जिसे कभी ‘गोल्डन गेट’ कहा गया, क्या अब ठहराव की ओर बढ़ रहा है?
ईरान की प्रतिक्रिया: ‘गोल्डन गेट’ पर विराम क्यों?
अब्बास अरागची ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि बजट में चाबहार के लिए राशि न रखना भारत और ईरान—दोनों के लिए निराशाजनक है। उन्होंने इस पोर्ट को वही “गोल्डन गेट” बताया, जिसका जिक्र नरेंद्र मोदी पहले कर चुके हैं। अरागची ने उम्मीद जताई कि परियोजना आगे बढ़ेगी और भारत-ईरान सहयोग जारी रहेगा।
आम बजट 2026-27: पहली बार ‘नो अमाउंट’
2026-27 के यूनियन बजट में पहली बार चाबहार पोर्ट के लिए कोई आवंटन नहीं किया गया। पिछले वर्षों में भारत करीब 100 करोड़ रुपये देता रहा है। यह निर्णय ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ा हुआ है और सख्त प्रतिबंध लागू हैं। भारत को मिली अस्थायी छूट भी अप्रैल 2026 में खत्म हो रही है।
पाकिस्तान को दरकिनार करने की रणनीति
ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित चाबहार, भारत को बिना पाकिस्तान से गुजरे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का रास्ता देता है। यह पोर्ट चीन समर्थित ग्वादर पोर्ट के प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति का हिस्सा भी माना जाता है। अगर यह परियोजना पूरी क्षमता से विकसित होती है तो भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और व्यापारिक पहुंच कई गुना बढ़ सकती है।
रणनीतिक मजबूरी या कूटनीतिक संतुलन?
विशेषज्ञ मानते हैं कि फंडिंग रोकना पूरी तरह पीछे हटना नहीं, बल्कि एक ‘वेट एंड वॉच’ नीति हो सकती है। भारत अभी भी परियोजना का प्रमुख डेवलपमेंट पार्टनर है और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत जारी है। आने वाले महीनों में प्रतिबंधों की स्थिति और वैश्विक समीकरण तय करेंगे कि चाबहार फिर रफ्तार पकड़ेगा या लंबी प्रतीक्षा में रहेगा।
भारत के लिए क्यों अहम है चाबहार?
चाबहार सिर्फ एक पोर्ट नहीं, बल्कि भारत की मध्य एशिया तक रणनीतिक पहुंच का द्वार है। यह प्रोजेक्ट लैंडलॉक्ड देशों के साथ व्यापार बढ़ाने, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का माध्यम है। बजट में विराम के बावजूद उम्मीद कायम है कि भारत और ईरान इस ‘गोल्डन गेट’ को बंद नहीं होने देंगे।