चैती छठ पूजा का पर्व आस्था और श्रद्धा का विशेष प्रतीक माना जाता है। यह पर्व खासतौर पर सूर्य देव और छठी मैया की उपासना के लिए मनाया जाता है। चार दिनों तक चलने वाले इस व्रत में हर दिन का अपना अलग महत्व होता है। वर्ष 2026 में दूसरे दिन यानी खरना का विशेष महत्व है, जिसके बाद 24 मार्च को अस्त होते सूर्य को संध्या अर्घ्य दिया जाएगा। इस पर्व को पूरी निष्ठा और नियमों के साथ मनाया जाता है।
खरना का महत्व
छठ पूजा के दूसरे दिन को खरना कहा जाता है, जो व्रत का सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है। इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं। खरना के दिन शुद्धता और नियमों का विशेष ध्यान रखा जाता है, जिससे व्रत की पवित्रता बनी रहती है।
खरना की पूजा विधि
इस दिन शाम के समय व्रती स्नान कर साफ-सुथरे वस्त्र पहनते हैं और पूजा की तैयारी करते हैं। मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ और चावल की खीर बनाई जाती है, जिसे प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है। पूजा के बाद व्रती सबसे पहले प्रसाद ग्रहण करते हैं और फिर परिवार के अन्य सदस्यों को वितरित करते हैं।
संध्या अर्घ्य का महत्व
खरना के अगले दिन यानी 24 मार्च को डूबते हुए सूर्य को संध्या अर्घ्य दिया जाएगा। यह छठ पूजा का सबसे प्रमुख अनुष्ठान होता है, जिसमें व्रती नदी या तालाब में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। इस दौरान पूरे वातावरण में भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
नियम और सावधानियां
छठ पूजा के दौरान साफ-सफाई और शुद्धता का विशेष ध्यान रखना जरूरी होता है। व्रती को सात्विक भोजन और संयमित जीवनशैली अपनानी चाहिए। पूजा में इस्तेमाल होने वाली सभी वस्तुएं शुद्ध होनी चाहिए। साथ ही मन में श्रद्धा और विश्वास बनाए रखना इस व्रत की सफलता के लिए आवश्यक है।
पावन पर्व
चैती छठ पूजा का यह पावन पर्व न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि अनुशासन और समर्पण का भी संदेश देता है। खरना से लेकर संध्या अर्घ्य तक हर चरण का अपना महत्व है। जो भी भक्त इस व्रत को पूरे विधि-विधान से करते हैं, उन्हें सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली का आशीर्वाद प्राप्त होता है।