Chandrajeet Rajawat Success : राजस्थान के उदयपुर के रहने वाले चंद्रजीत सिंह राजावत की सफलता की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है. एक समय ऐसा था जब उनके पिता ने शतरंज को लेकर कहा था, “ये बच्चों का खेल नहीं, तुम समझ नहीं पाओगे.” यही बात चंद्रजीत के दिल में उतर गई और उन्होंने खुद को साबित करने का फैसला कर लिया. उन्होंने न सिर्फ शतरंज सीखा बल्कि अगले ही दिन अपने पिता को उसी खेल में हरा दिया. यहीं से उनके सफर की शुरुआत हुई.
क्रिकेट से शुरू हुआ खेलों का सफर
शतरंज से पहले चंद्रजीत का पहला प्यार क्रिकेट था. वह क्रिकेट में आगे बढ़ना चाहते थे, लेकिन टीम चयन और कड़ी प्रतिस्पर्धा को देखते हुए उन्होंने दूसरा रास्ता चुना. इसी दौरान वह IIT की तैयारी भी कर रहे थे. 2011-12 के आसपास जब उनकी उम्र करीब 16 साल थी, तब शतरंज के प्रति उनका झुकाव बढ़ा और धीरे-धीरे वह इस खेल में पहचान बनाने लगे.
परिवार की नाराजगी के बीच जारी रखा खेल
चंद्रजीत की बढ़ती शतरंज गतिविधियों को देखकर उनके माता-पिता चिंतित हो गए. उन्हें डर था कि कहीं बेटा पढ़ाई और IIT का सपना न छोड़ दे. परिवार ने उन्हें शतरंज से दूरी बनाने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने चुपचाप खेलना जारी रखा. टूर्नामेंट जीतने पर उनका नाम अखबारों में छपता था और तब घर में डांट भी पड़ती थी. इसके बावजूद उन्होंने अपने जुनून को नहीं छोड़ा.
IIT का मौका छोड़ा, घर भी छोड़ना पड़ा
चंद्रजीत ने IIT की परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया और अच्छी रैंक भी हासिल की. लेकिन उन्होंने काउंसलिंग फॉर्म तक नहीं भरा. उनका मन पूरी तरह शतरंज में लग चुका था. इस फैसले से परिवार नाराज हो गया. घर में लगातार बहस होने लगी. आखिरकार उन्होंने घर छोड़ने का फैसला किया और अपने सपनों को पूरा करने के लिए दिल्ली चले आए.
संघर्ष ऐसा कि सड़क पर भी गुजारी रातें
दिल्ली पहुंचने के बाद चंद्रजीत का संघर्ष और बढ़ गया. आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी. कई बार उनके पास खाने तक के पर्याप्त पैसे नहीं होते थे. टूर्नामेंट खेलने के लिए उन्होंने तमाम मुश्किलों का सामना किया. कुछ मौकों पर उन्हें सड़क पर रात गुजारनी पड़ी. लेकिन इन कठिन परिस्थितियों ने उनका हौसला नहीं तोड़ा. उनका पूरा ध्यान सिर्फ शतरंज में आगे बढ़ने पर था.
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राजस्थान के पहले AGM बने
लगातार मेहनत और संघर्ष का फल आखिरकार मिला. चंद्रजीत सिंह राजावत राजस्थान के पहले एरिना ग्रैंडमास्टर (AGM) बने. उन्होंने कई बड़े खिलाड़ियों को चुनौती दी और अपनी अलग पहचान बनाई. साल 2019 में वह उदयपुर लौटे और ‘किंगडम ऑफ चेस’ एकेडमी की शुरुआत की. आज उनकी एकेडमी 30 देशों तक पहुंच चुकी है. उनके मार्गदर्शन में कई खिलाड़ियों ने राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते हैं. चंद्रजीत की कहानी यह साबित करती है कि जुनून और मेहनत के सामने मुश्किलें ज्यादा देर तक टिक नहीं सकतीं