सिंधु जल संधि के स्थगन के बाद भारत ने जल और ऊर्जा संसाधनों के उपयोग की दिशा में बड़ा कदम बढ़ा दिया है। जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर बनने वाले सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के लिए निर्माण प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह परियोजना न केवल बिजली उत्पादन बढ़ाएगी, बल्कि बदलते कूटनीतिक हालात के बीच भारत की रणनीतिक मजबूती को भी दर्शाती है।
सावलकोट परियोजना को मिली औपचारिक मंजूरी
चिनाब नदी पर प्रस्तावित सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को लेकर सरकारी एजेंसी ने निर्माण कार्य के लिए टेंडर जारी कर दिए हैं। करीब 5129 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना को एक ही पैकेज में तैयार किया जाएगा। दस्तावेजों के अनुसार इसमें डाइवर्जन टनल, एडिट, कोफर डैम, स्पाइरल टनल, एक्सेस रोड और अन्य सहायक संरचनाओं का निर्माण शामिल होगा। बोली प्रक्रिया मार्च में शुरू होकर कुछ ही दिनों में पूरी की जाएगी, जबकि निर्माण के लिए लगभग नौ वर्षों की समयसीमा तय की गई है।
1856 मेगावाट बिजली का लक्ष्य
इस परियोजना से कुल 1856 मेगावाट बिजली उत्पादन का अनुमान है। माना जा रहा है कि इससे जम्मू-कश्मीर की ऊर्जा जरूरतें काफी हद तक पूरी होंगी और राष्ट्रीय बिजली ग्रिड को भी मजबूती मिलेगी। पहाड़ी क्षेत्रों में जलविद्युत क्षमता के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में इसे एक अहम कदम माना जा रहा है, जिससे दीर्घकाल में ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।
सिंधु जल संधि स्थगन की पृष्ठभूमि
अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम क्षेत्र में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला लिया था। हमले में कई निर्दोष नागरिकों की जान गई थी, जिसके बाद सरकार ने स्पष्ट रुख अपनाया कि सीमा पार आतंकवाद जारी रहने की स्थिति में समझौते से जुड़े दायित्वों पर पुनर्विचार किया जाएगा। इसी कड़ी में जल संसाधनों के घरेलू उपयोग को प्राथमिकता देने की नीति को आगे बढ़ाया गया है।
क्या है सिंधु जल संधि
वर्ष 1960 में हुई इस संधि के तहत पूर्वी नदियों—रावी, ब्यास और सतलुज—पर भारत को पूर्ण अधिकार मिला, जबकि पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब—का अधिकांश जल पाकिस्तान को आवंटित किया गया। भारत को इन नदियों पर सीमित गैर-उपभोगीय उपयोग, जैसे जलविद्युत परियोजनाएं, विकसित करने की अनुमति है। मौजूदा हालात में सरकार का संकेत है कि राष्ट्रीय हित और सुरक्षा सर्वोपरि रहेंगे।
किसानों और रणनीतिक हितों पर फोकस
सरकार का कहना है कि देश के जल संसाधनों का इस्तेमाल प्राथमिक तौर पर घरेलू जरूरतों और किसानों के हित में किया जाएगा। नेतृत्व की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी तरह के दबाव के बावजूद राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं किया जाएगा। सावलकोट परियोजना को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो जल प्रबंधन, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन—तीनों पर असर डाल सकती है।