लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा सूर्य उपासना और शुद्धता का प्रतीक है। इस पर्व में उपयोग होने वाली हर सामग्री का विशेष धार्मिक महत्व होता है, जिनमें से एक है — गन्ना (Sugarcane)। मान्यता है कि छठ पूजा गन्ने के बिना अधूरी मानी जाती है, क्योंकि यह न सिर्फ छठी मैया को प्रिय है, बल्कि पवित्रता, समृद्धि और नई फसल के प्रतीक के रूप में भी पूजनीय है। आइए जानते हैं, आखिर क्यों गन्ने के बिना अधूरी मानी जाती है छठ पूजा।
छठ पूजा की पवित्र परंपरा
छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला लोक आस्था का त्योहार है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है, उसके बाद खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के साथ यह व्रत पूर्ण होता है। इस दौरान व्रती उपवास रखकर सूर्य देव और छठी मैया की आराधना करते हैं। पूजा में प्रयुक्त हर वस्तु प्रकृति और कृषि से जुड़ी होती है, जो जीवन के संतुलन और आभार का प्रतीक है।
गन्ने से बनता है छठ का मंडप
छठ पूजा में गन्ने की भूमिका सिर्फ प्रसाद तक सीमित नहीं है। पूजा स्थल या घर के आंगन में गन्ने के पत्तों और तनों से एक मंडप या ‘छतरनुमा’ आकृति बनाई जाती है। इसी मंडप के नीचे कोसी रखकर व्रती पूजा करते हैं। लोक मान्यता है कि यह मंडप छठी मैया को अत्यंत प्रिय है, और इसी के नीचे पूजा करने से देवी प्रसन्न होती हैं।
पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक
गन्ना एक पवित्र और सशक्त पौधा माना जाता है। इसे न तो जानवर खाते हैं और न ही यह जल्दी खराब होता है। इसलिए इसे शुद्धता का प्रतीक माना गया है। छठ पूजा में गन्ना रखने से घर में सुख-शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि बनी रहती है। गन्ने के रस और गुड़ से खरना का प्रसाद बनाया जाता है, जो नई फसल के स्वागत का संकेत है।
क्यों अधूरी मानी जाती है छठ पूजा गन्ने के बिना
गन्ना सूर्य देव और छठी मैया दोनों का प्रिय माना गया है। यह धरती की उपज, पवित्रता और जीवन के मधुर स्वरूप का प्रतीक है। इसलिए हर व्रती अपने पूजन स्थल पर गन्ने का अनिवार्य रूप से उपयोग करता है। यही कारण है कि लोकमान्यता के अनुसार गन्ने के बिना छठ पूजा को अधूरा माना जाता है।