छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में एक ऐसा रहस्यमयी नाग मंदिर स्थित है, जहां हर नाग पंचमी पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है। दंतेवाड़ा जिले के गीदम से लगभग 10 किलोमीटर दूर नागफनी गांव में स्थित यह मंदिर न सिर्फ ऐतिहासिक धरोहर है, बल्कि आस्था और चमत्कारों का केन्द्र भी माना जाता है। मान्यता है कि यहां नागदेव की पूजा करने से चर्म रोग, निःसंतानता, मासिक धर्म की समस्या और पारिवारिक क्लेश जैसे गंभीर कष्ट दूर हो जाते हैं। इस मंदिर से जुड़े चमत्कारों की चर्चाएं पूरे अंचल में होती रहती हैं।
नागवंशी राजाओं की आस्था से बना नागफनी मंदिर
यह भव्य नाग मंदिर 11वीं शताब्दी में छिंदक नागवंशी राजाओं द्वारा बनवाया गया था। नागवंशी राजा नागों के उपासक माने जाते थे और उन्होंने इस मंदिर में शेषनाग की विशाल मूर्ति स्थापित की थी। यही मूर्ति आज नागफनी मंदिर की पहचान है। यह मंदिर पश्चिममुखी है और इसमें प्रवेश करते ही दाएं-बाएं की दीवारों पर विशाल नृत्यांगना, नरसिंह और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां नजर आती हैं।
चमत्कारिक मन्नतें और नागों का संरक्षण
स्थानीय पुजारी के अनुसार यहां आज भी जोड़ा नाग के दर्शन होते हैं और कभी किसी भक्त को नुकसान नहीं पहुंचाते। पास के गांव घोटपाल के एक परिवार की खुजली की बीमारी नागदेव से मन्नत मांगने के बाद पूरी तरह ठीक हो गई थी। मंदिर में पीतल, चांदी या धातु से बने सांप चढ़ाने की परंपरा है। जो लोग गलती से नाग को नुकसान पहुंचा बैठते हैं, वे यहां आकर क्षमा मांगते हैं और नाग देव को सांप चढ़ाकर प्रायश्चित करते हैं।
महिलाओं की आस्था का केंद्र बना मंदिर
इस मंदिर को लेकर खास मान्यता है कि मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं से पीड़ित महिलाएं यहां मन्नत मांगती हैं और उन्हें राहत भी मिलती है। इतना ही नहीं, निःसंतान दंपती संतान प्राप्ति की कामना लेकर यहां आते हैं। नाग पंचमी के अवसर पर यहां विशाल मेला लगता है और विशेष पूजा-अर्चना होती है।
कलात्मक मूर्तियों और प्राचीन धरोहरों से सजा परिसर
मंदिर के गर्भगृह में नाग-नागिन, गणेश, सूर्य, भगवान राम-लक्ष्मण, भगवान कृष्ण और बलराम सहित अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। ये मूर्तियां 11वीं से 13वीं शताब्दी की हैं और कलात्मक दृष्टि से बेहद अनूठी हैं। इसके अलावा परिसर में अलग-अलग प्रजातियों के सांपों की चित्रकारी और शिल्प भी देखने को मिलती है।