भारत विविध परंपराओं और सांस्कृतिक विविधताओं का देश है, जहां हर गांव, हर जाति और हर परिवार की अपनी खास मान्यताएं हैं। कुछ परंपराएं गौरवशाली होती हैं तो कुछ चौंका देने वाली। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के कोसमी गांव की एक परंपरा ऐसी ही है, जो सुनकर हर कोई हैरान रह जाता है। यहां शादी के बाद दुल्हनें सोलह श्रृंगार नहीं करतीं, सिंदूर नहीं लगातीं, रंगीन कपड़े नहीं पहनतीं और सजना-संवरना उनके लिए मना है। यह परंपरा महज एक सामाजिक मान्यता नहीं बल्कि मां देवी के श्राप से जुड़ी मानी जाती है।
शादी के बाद 'विधवा' जैसी जिंदगी क्यों?
कोसमी गांव में 'पुजारी परिवार' की महिलाओं को शादी के बाद सफेद साड़ी पहननी होती है। माथे पर सिंदूर, हाथों में चूड़ियां, गले में मंगलसूत्र या मेकअप जैसी चीजें पूरी तरह वर्जित हैं। परिवार की बहुएं खुद को सजाने-संवारने के बजाय बिल्कुल सादगी से जीवन जीती हैं।
10 पीढ़ियों से चल रही परंपरा
परिवार की महिलाओं का कहना है कि यह करीब 10 पीढ़ियों पुरानी परंपरा है। उनके मुताबिक, घर की कोई भी बहू अगर श्रृंगार करती है या रंगीन कपड़े पहनती
है तो उसके शरीर में असाधारण परेशानियां शुरू हो जाती हैं। इस डर और आस्था के चलते महिलाएं खुशी-खुशी इस परंपरा को निभा रही हैं।
बेटी के लिए नहीं है ये नियम
गौर करने वाली बात यह है कि यह नियम सिर्फ बहुओं पर लागू होता है, बेटियों को इससे छूट दी गई है। बेटियां अपने मन मुताबिक कपड़े पहन सकती हैं, मेकअप कर सकती हैं और सज-धज सकती हैं। परंपरा बहू तक सीमित रखी गई है।
मां देवी का श्राप बना वजह!
परिवार के मुखिया का कहना है कि मां देवी ने पुजारी परिवार को श्राप दिया था कि अगर बहू श्रृंगार करेगी तो संकट आएगा। तब से लेकर आज तक घर की कोई बहू रंगीन कपड़े या श्रृंगार करने की हिम्मत नहीं करती। और आश्चर्य की बात यह है कि इस परंपरा को सभी स्वीकार भी करते हैं, चाहे वो नई बहू हो या ससुराल वाले।
फिर भी इस परिवार में शादी को मानते हैं सौभाग्य
इतनी सख्त परंपरा होने के बावजूद लोग इस पुजारी परिवार में अपनी बेटियों की शादी को सौभाग्य मानते हैं। बहुएं भी बिना किसी आपत्ति के इस परंपरा को अपनाकर गर्व महसूस करती हैं।