भारत की जनजातियां अपने अनूठे रीति-रिवाजों और परंपराओं के लिए जानी जाती हैं।छत्तीसगढ़ की पहाड़ी कोरवा जनजाति की एक ऐसी ही परंपरा है, जो हैरान कर देने वाली है।यहां जब किसी की मौत होती है, तो लोग मातम मनाने के बजाय नया घर बनाते हैं।हर मृत्यु के बाद पुराने घर को छोड़कर नया आशियाना खड़ा किया जाता है।ऐसा करने के पीछे एक गहरी मान्यता जुड़ी हुई है – आत्मा के डर से मुक्ति पाने की।ये लोग मानते हैं कि मृत आत्माएं पुराने घर में भटकती हैं और शांति नहीं देतीं।मिट्टी और लकड़ी से बने इन घरों में प्रकृति का गहरा स्पर्श होता है।इनकी यह परंपरा न सिर्फ अनोखी है, बल्कि समाज और संस्कृति का अद्भुत उदाहरण भी है।
हर मौत के बाद बनता है नया घर
छत्तीसगढ़ के सरगुजा क्षेत्र में बसने वाली पहाड़ी कोरवा जनजाति की यह परंपरा बेहद खास है। जब इनके परिवार या समुदाय में किसी की मृत्यु होती है, तो वे उस घर को छोड़कर नया घर बनाते हैं। इसका कारण है – आत्मा के डर से पीछा छुड़ाना। ऐसा माना जाता है कि मृत व्यक्ति की आत्मा पुराने घर में भटकती है।
मिट्टी-लकड़ी से बनता है नया आशियाना
इनके लिए नया घर बनाना कोई मुश्किल काम नहीं होता। ये लोग अपने घरों का निर्माण मिट्टी, लकड़ी और जंगल से मिली प्राकृतिक वस्तुओं से करते हैं। न सीमेंट न सरिया – प्रकृति ही इनका आर्किटेक्ट होती है। इसलिए हर मौत पर एक नए घर का बनना इनके जीवन का हिस्सा बन गया है।
खान-पान और जीवनशैली
कोरवा जनजाति की भोजन शैली भी बेहद पारंपरिक है। ये लोग मिट्टी के बर्तनों में खाना खाते हैं और जंगल में पाए जाने वाले फल, फूल व कंदमूल से अपना गुजारा करते हैं। इनका जीवन पूरी तरह प्रकृति पर आधारित होता है, और आम लोगों से ये दूरी बनाए रखते हैं।
सरकारी योजनाओं से मिल रहा सहारा
हालांकि कोरवा जनजाति आधुनिक जीवनशैली से दूर हैं, लेकिन सरकार की योजनाओं का लाभ इन्हें मिल रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में इनके विकास के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि ये मुख्यधारा से जुड़ सकें।