मध्य प्रदेश के कटनी जिले से आंगनबाड़ी व्यवस्था की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी दावों की पोल खोलकर रख दी है। मासूम बच्चे ज़मीन पर बैठकर मध्यान्ह भोजन कर रहे हैं और उसी थाली में बकरियां भी मुंह डालती नजर आ रही हैं। यह दृश्य न सिर्फ लापरवाही दर्शाता है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में बच्चों के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ की कहानी भी बयां करता है।
आंगनबाड़ी केंद्र की हकीकत आई सामने
कटनी जिले की ढीमरखेड़ा तहसील के कोठी गांव के सेहरा टोला में आंगनबाड़ी व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई दिखाई दी। यहां छोटे-छोटे बच्चे खुले में बैठकर भोजन करते हैं, जहां न साफ-सफाई है और न ही सुरक्षा। इसी दौरान बकरियों का बच्चों के बीच भोजन करते हुए दिखाई देना प्रशासनिक उदासीनता का जीता-जागता उदाहरण बन गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यह स्थिति लंबे समय से बनी हुई है, लेकिन अब जाकर तस्वीरों के जरिए सच्चाई उजागर हुई है।
पानी, भवन और स्टाफ—हर मोर्चे पर कमी
ग्रामीणों के अनुसार इस टोले में पीने के साफ पानी की गंभीर समस्या है। आंगनबाड़ी के लिए न तो पक्का भवन है और न ही नियमित कार्यकर्ता। भोजन बनाने और परोसने की कोई तय व्यवस्था नहीं है। बच्चे आते हैं, खेलते हैं और बिना किसी निगरानी के भोजन कर लेते हैं। शिक्षा और पोषण, दोनों ही उद्देश्यों पर यहां सवाल खड़े हो रहे हैं।
टीकाकरण और स्वास्थ्य सेवाओं से दूरी
स्थानीय महिलाओं ने बताया कि बच्चों और गर्भवती महिलाओं के टीकाकरण के लिए करीब ढाई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। कई बार संसाधनों के अभाव में महिलाएं वहां तक नहीं पहुंच पातीं, जिससे बच्चों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाता है। आंगनबाड़ी, जो ग्रामीण स्वास्थ्य की रीढ़ मानी जाती है, यहां नाम मात्र की रह गई है।
शिकायतें हुईं, पर समाधान नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार जिला स्तर के अधिकारियों को समस्याओं से अवगत कराया है। यहां तक कि राज्य स्तर के दौरों के दौरान भी अपनी बात रखी गई, लेकिन हालात में कोई सुधार नहीं हुआ। हर बार आश्वासन तो मिला, लेकिन ज़मीनी बदलाव आज तक नहीं दिखा।
ग्रामीणों की मांग—तुरंत हो ठोस कार्रवाई
इस मामले के सामने आने के बाद गांव में आक्रोश का माहौल है। ग्रामीणों की मांग है कि जल्द से जल्द आंगनबाड़ी भवन, नियमित कार्यकर्ता, स्वच्छ पानी और बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराया जाए। उनका कहना है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो बच्चों के पोषण और शिक्षा दोनों पर इसका गहरा असर पड़ेगा।