भारत और चीन के रिश्तों में पिछले कुछ सालों से तनाव रहा है। साल 2020 में सीमा विवाद के बाद भारत सरकार ने चीन से आने वाले निवेश पर सख्ती कर दी थी। लेकिन अब हालात धीरे-धीरे बदलते दिख रहे हैं। खबर है कि सरकार चीन से आने वाले निवेश के नियमों में कुछ ढील देने पर विचार कर रही है। माना जा रहा है कि इससे उद्योग जगत को राहत मिल सकती है।
क्या है पुराना सख्त नियम
अप्रैल 2020 में सरकार ने एक खास नियम लागू किया था, जिसके तहत सीमा से जुड़े देशों से आने वाले हर निवेश को सरकारी मंजूरी जरूरी कर दी गई थी। इसका मकसद भारतीय कंपनियों को सस्ते दाम पर विदेशी अधिग्रहण से बचाना था। खास तौर पर चीन को ध्यान में रखकर यह कदम उठाया गया था। इसके बाद चीन से सीधे निवेश लगभग रुक गया था।
अब छोटे निवेश को मिल सकती है छूट
अब चर्चा है कि सरकार छोटे स्तर के निवेश के लिए प्रक्रिया आसान कर सकती है। यानी अगर निवेश की रकम या हिस्सेदारी एक तय सीमा से कम होगी, तो उसे लंबी सरकारी मंजूरी की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे उन भारतीय कंपनियों को फायदा होगा, जिन्हें तकनीक या पूंजी के लिए चीनी साझेदारों की जरूरत है। हालांकि बड़ा और रणनीतिक निवेश अब भी जांच के दायरे में रहेगा।
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ज्वाइंट वेंचर का नया रास्ता
इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कंपनियां चाहती हैं कि उन्हें चीनी कंपनियों के साथ साझेदारी की अनुमति मिले। प्रस्ताव यह है कि चीनी कंपनी की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत तक सीमित रहे, ताकि नियंत्रण भारतीय कंपनी के पास ही रहे। इससे तकनीक और निवेश तो मिलेगा, लेकिन निर्णय लेने की ताकत भारत के हाथ में रहेगी।
मेक इन इंडिया को मिल सकता है बल
कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर विदेशी कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाती हैं, तो इससे घरेलू उत्पादन बढ़ेगा। आयात कम होगा और रोजगार के मौके बनेंगे। इसी सोच के तहत कहा जा रहा है कि सावधानी के साथ निवेश को मंजूरी दी जा सकती है। मकसद यह है कि उत्पादन भारत में हो, भले ही पैसा बाहर से आए।
सुरक्षा पर रहेगी कड़ी नजर
सरकार साफ कर चुकी है कि सुरक्षा से समझौता नहीं होगा। जिन निवेशों का संबंध संवेदनशील क्षेत्रों से होगा, उनकी जांच पहले की तरह जारी रहेगी। गृह और विदेश मंत्रालय हर प्रस्ताव को ध्यान से परखेंगे। यानी रास्ता पूरी तरह खुलने वाला नहीं है, बल्कि सीमित और शर्तों के साथ बदलाव की तैयारी है।