जहां एक तरफ ईरान-अमेरिका तनाव और वैश्विक सप्लाई संकट के कारण कई देशों में ईंधन की चिंता बढ़ गई है, वहीं चीन अपेक्षाकृत शांत नजर आ रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक देश होने के बावजूद चीन ने पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कदम उठाए हैं, जिनकी वजह से उसकी तेल पर निर्भरता लगातार कम होती जा रही है। यही कारण है कि मौजूदा वैश्विक संकट का असर चीन पर पहले की तुलना में काफी सीमित दिखाई दे रहा है।
तेल की मांग में आई बड़ी गिरावट
चीन की प्रमुख रिफाइनिंग कंपनी सिनोपेक के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल में पेट्रोल की बिक्री में 8 प्रतिशत और डीजल की बिक्री में 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। वहीं कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि पेट्रोलियम उत्पादों की कुल खपत में और भी बड़ी कमी देखने को मिली है। खास बात यह है कि यह गिरावट किसी आर्थिक लॉकडाउन या मंदी की वजह से नहीं, बल्कि लोगों की बदलती जीवनशैली और परिवहन आदतों के कारण हुई है।
रेल नेटवर्क बना सबसे बड़ा हथियार
चीन ने बीते वर्षों में हाई-स्पीड रेल और सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क पर भारी निवेश किया है। अब बड़ी संख्या में लोग निजी वाहनों की जगह ट्रेन और मेट्रो का इस्तेमाल कर रहे हैं। परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक मार्च और अप्रैल में रेल यात्राओं में सालाना आधार पर 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इससे सड़क परिवहन पर निर्भरता कम हुई और ईंधन की खपत में भी गिरावट आई।
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इलेक्ट्रिक वाहनों ने बदली तस्वीर
चीन दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक वाहन बाजार बन चुका है। देश के कई शहरों में टैक्सी, बसें और सार्वजनिक परिवहन का बड़ा हिस्सा इलेक्ट्रिक हो चुका है। अप्रैल में ईवी चार्जिंग गतिविधियों में 69 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। मई दिवस की छुट्टियों के दौरान हाईवे पर चलने वाले लगभग 25 प्रतिशत वाहन इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड थे। इससे पेट्रोल और डीजल की मांग पर सीधा असर पड़ा है।
महंगा तेल खरीदने के बजाय पुराने भंडार का इस्तेमाल
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के बाद चीन ने नई खरीद कम कर दी और अपने रणनीतिक भंडार का इस्तेमाल शुरू किया। नतीजतन मई में उसका तेल आयात घटकर 7.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया, जो पिछले कई वर्षों का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। इससे चीन को महंगे आयात से राहत मिली और विदेशी मुद्रा पर दबाव भी कम हुआ।
डीजल की मांग घटने के पीछे एक और कारण
चीन के रियल एस्टेट सेक्टर में लंबे समय से जारी सुस्ती का असर भी डीजल की मांग पर पड़ा है। निर्माण गतिविधियां कमजोर होने से भारी मशीनों और ट्रकों की जरूरत कम हुई है। इसके अलावा लॉजिस्टिक्स और खनन क्षेत्र में भी कई कंपनियां डीजल ट्रकों की जगह इलेक्ट्रिक वाहनों को अपना रही हैं। यही वजह है कि चीन की ऊर्जा खपत का ढांचा तेजी से बदल रहा है और वह तेल आधारित अर्थव्यवस्था से धीरे-धीरे दूरी बना रहा है।