
भारत के पड़ोसी देशों के साथ चीन के बढ़ते सैन्य रिश्ते एक नई रणनीतिक चिंता का विषय बन गए हैं। पहले फाइटर जेट, मिसाइल सिस्टम और डिफेंस टेक्नोलॉजी—और अब सबमरीन—इन सभी के जरिए चीन पाकिस्तान को न सिर्फ सैन्य रूप से मज़बूत कर रहा है, बल्कि हिंद महासागर में अपने प्रभाव को गहराने की कोशिश भी कर रहा है।
JF-17 थंडर लड़ाकू विमान
पिछले कुछ वर्षों में चीन-पाकिस्तान रक्षा सहयोग तेज़ी से बढ़ा है। JF-17 थंडर लड़ाकू विमान से लेकर उन्नत रडार और मिसाइल तकनीक तक, चीन ने पाकिस्तान की सैन्य ज़रूरतों को पूरा करने में अग्रणी भूमिका निभाई है। अब ‘हैवीवेट’ कदम के रूप में चीन पाकिस्तान को आठ आधुनिक Hangor-class submarines देने जा रहा है। इनमें से कुछ पाकिस्तान में ही असेंबल की जाएंगी, जिससे इस्लामाबाद की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को भी बल मिलेगा।
समुद्री पकड़
लेकिन सवाल यह है कि आखिर चीन इस सबके पीछे चाहता क्या है? विश्लेषकों के मुताबिक, बीजिंग का असली मकसद भारत को रणनीतिक रूप से ‘घेरने’ का है। पाकिस्तान के जरिए चीन हिंद महासागर में अपनी नौसैनिक मौजूदगी को मजबूत करना चाहता है, ताकि दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के बीच अपनी समुद्री पकड़ बना सके। इसके साथ ही, ग्वादर पोर्ट और सी-पैक (CPEC) प्रोजेक्ट चीन की String of Pearls रणनीति का अहम हिस्सा हैं, जो हिंद महासागर में कई छोटे-बड़े ठिकानों के जरिए भारत की समुद्री सुरक्षा पर दबाव बनाते हैं।
दीर्घकालिक भू-राजनीतिक
भारत के लिए यह स्थिति नई नहीं है, लेकिन चुनौती पहले से कहीं बड़ी हो चुकी है। सबमरीन डील से पाकिस्तान को समुद्र में निगरानी और रणनीतिक हमले की क्षमता मिलेगी, जबकि चीन को क्षेत्रीय ताकत के रूप में अधिक प्रभाव दिखाने का मौका।
ड्रैगन की यह चाल साफ़ तौर पर केवल दोस्ती नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक भू-राजनीतिक गेम है — जिसमें पाकिस्तान उसका मोहरा बनता दिख रहा है, और भारत को चौकन्ना रहना होगा कि कहीं यह ‘समुद्री घेरा’ उसकी सुरक्षा रणनीति के चारों ओर कस न जाए।