चीन ने अंटार्कटिका में अपनी मौजूदगी और गतिविधियों को लेकर नियमन का दायरा बढ़ाने की तैयारी कर ली है। देश ने अंटार्कटिका में वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यटन, जहाजों की आवाजाही और अन्य गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए एक नया कानून मंजूर किया है। इसका प्रमुख उद्देश्य वैज्ञानिक शोध को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ दुनिया के सबसे संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्रों में शामिल अंटार्कटिका के पर्यावरण को सुरक्षित रखना है। चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने शुक्रवार को इस कानून की जानकारी दी।
सुरक्षा मानकों का पालन करना अनिवार्य होगा
नए कानून के लागू होने के बाद अंटार्कटिका में चीन से जुड़ी गतिविधियों के लिए पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा मानकों का पालन करना अनिवार्य होगा। इसके तहत वहां किसी भी तरह की गतिविधि शुरू करने से पहले निर्धारित शर्तों को पूरा करना होगा। चीन का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जब दुनिया के कई देश अंटार्कटिका और आर्कटिक जैसे ध्रुवीय क्षेत्रों में अपनी वैज्ञानिक और रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने में जुटे हैं।
वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा पर जोर
नए कानून में अंटार्कटिका के प्राकृतिक पर्यावरण और जैव विविधता को सुरक्षित रखने पर विशेष ध्यान दिया गया है। इसके तहत वहां मौजूद वनस्पतियों और वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर नियंत्रण रखने की व्यवस्था की गई है। चीन की ओर से संचालित रिसर्च और अन्य अभियानों में पर्यावरण संरक्षण के नियमों का पालन करना होगा।
कानून में कचरे के निपटारे को लेकर भी प्रावधान किए गए हैं। अंटार्कटिका में पैदा होने वाले कचरे को निर्धारित नियमों के अनुसार हटाना या उसका निपटारा करना होगा। इसके अलावा समुद्री प्रदूषण को रोकने और मानवीय गतिविधियों से वहां के प्राकृतिक वातावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के लिए भी जरूरी कदम उठाने होंगे।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वैज्ञानिक अनुसंधान और अन्य गतिविधियों के कारण अंटार्कटिका के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान न पहुंचे।
रिसर्च, पर्यटन और जहाजों की आवाजाही पर लागू होंगे नियम
चीन के नए कानून में अंटार्कटिका में होने वाली अलग-अलग गतिविधियों के लिए अनुमति और नियमन से जुड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं। इसके तहत वैज्ञानिक अनुसंधान दलों, पर्यटन अभियानों, जहाजों की आवाजाही और अन्य गतिविधियों को तय पर्यावरणीय एवं सुरक्षा मानकों के अनुरूप संचालित करना होगा।
यानी अब चीन से जुड़े अभियानों को अंटार्कटिका में काम करने के लिए निर्धारित प्रक्रियाओं और शर्तों का पालन करना पड़ेगा। इन नियमों के जरिए वहां होने वाली गतिविधियों की निगरानी और उनके प्रभाव को नियंत्रित करने की व्यवस्था मजबूत होगी।
दो साल से अंटार्कटिका में निगरानी स्टेशन चला रहा चीन
चीन पिछले दो वर्षों से अंटार्कटिका में एक वायुमंडलीय निगरानी स्टेशन संचालित कर रहा है। इस स्टेशन के माध्यम से वातावरण में होने वाले बदलावों और जलवायु से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर नजर रखी जाती है। इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन को समझने और उससे निपटने के लिए वैश्विक वैज्ञानिक प्रयासों में योगदान देना भी है।
चीन लगातार ध्रुवीय क्षेत्रों में अपनी वैज्ञानिक गतिविधियों का विस्तार कर रहा है। अंटार्कटिका के अलावा आर्कटिक क्षेत्र में भी उसकी दिलचस्पी बढ़ी है। अमेरिका समेत कई अन्य देश भी इन क्षेत्रों में वैज्ञानिक अनुसंधान और अपनी मौजूदगी को मजबूत करने पर काम कर रहे हैं।
ध्रुवीय क्षेत्रों में वैज्ञानिक महत्व के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिलचस्पी बनी हुई है। ऐसे में चीन का नया कानून उसकी अंटार्कटिका नीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या है अंटार्कटिक संधि, जिसके तहत संरक्षित है यह क्षेत्र?
अंटार्कटिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 1959 में अंटार्कटिक संधि (Antarctic Treaty) पर हस्ताक्षर किए गए थे। यह संधि 1961 में लागू हुई। इसका मुख्य उद्देश्य अंटार्कटिका को शांतिपूर्ण उद्देश्यों और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सुरक्षित रखना है।
इस संधि के तहत अंटार्कटिका में सैन्य गतिविधियों पर प्रतिबंध है। यहां सैन्य ठिकाने स्थापित करने, हथियारों का परीक्षण करने और सैन्य प्रकृति के अभियानों की अनुमति नहीं है। हालांकि शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए सैन्य कर्मियों और उपकरणों का इस्तेमाल किया जा सकता है।