बिहार की चुनावी पिच पर इस बार सबसे बड़ा कमाल मोदी के 'हनुमान' ने किया है, जिनकी धुआंधार बैटिंग ने न सिर्फ विरोधियों को चारों खाने चित किया बल्कि विपक्ष की सारी गणित की हवा निकालकर रख दी हैं, जो लोग चिराग पासवान को लेकर सवाल उठा रहे थे, उनको अब चुनावी रिजल्ट से जवाब मिला है, क्योंकि 28 सीटों पर चुनाव लड़कर 21 सीटों पर चिराग पासवान का जादू दिखा है, आपको बता दें इससे पहले एग्जिट पोल में चिराग पासवान को 8 से 16 सीटें दी जा रही थी, लेकिन नतीजों ने चुनावी विश्लेषकों की सारी गणितें हवा कर दीं. 28 में से 21 सीटों पर बढ़त तेजस्वी ने हासिल कर रखी यानी 85% स्ट्राइक रेट, जो एनडीए में सबसे ज्यादा है. दावा है कि इस एक प्रदर्शन ने चिराग को सीधे बिहार के गेंद-बल्ला दोनों संभालने वाले स्टार खिलाड़ी की तरह पेश किया है. विरोधियों को लगा था कि चिराग की चमक फीकी पड़ जाएगी, लेकिन उन्होंने तो मैदान पर ऐसा जलवा दिखाया कि चर्चा सिर्फ उनके नाम की होने लगी.
विरोधियों की सारी रणनीति पस्त
महागठबंधन और कई राजनीतिक पंडित मान रहे थे कि 2020 के कमजोर प्रदर्शन के बाद चिराग इस बार कोई बड़ा कमाल नहीं कर पाएंगे लेकिन चिराग ने ऐसा गेम खेला कि विरोधियों की सारे बल्लेबाज पवेलियन लौटते नजर आए. 2020 में जिन सीटों पर एनडीए को हार मिली थी, उन सीटों पर भी इस बार चिराग की पार्टी ने बढ़त बनाए रखी, पासवान वोट बैंक, युवा लहर और मोदी फैक्टर इन तीनों ने मिलकर चिराग की पूरी पारी को हाई-वोल्टेज बना दिया. तेजस्वी यादव और महागठबंधन का पूरा इलाकाई कैम्पेन चिराग की इस आक्रामक बल्लेबाजी के आगे ढहता दिखाई दिया. बता दें एनडीए में सीट बंटवारे के समय जेडीयू का एक बड़ा धड़ा चिराग को 29 सीटें देने के खिलाफ था लेकिन रुझान आते ही वही लोग चिराग की तारीफ करते नहीं थक रहे.
युवाओं की पहली पसंद बने चिराग
चिराग की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण रहा युवाओं का समर्थन। सोशल मीडिया की भाषा, स्टाइल, चुनावी भाषण और मोदी के साथ उनकी राजनीतिक केमिस्ट्री इन सबने मिलकर युवा वोटरों को सीधा उनकी तरफ खींच लिया। कई जिलों में युवा वोटरों ने कहा कि चिराग ‘बिहार की नई उम्मीद’ हैं. पहली बार वोट डालने वाले युवा, दलित समर्थक, मोदी फैन सभी ने इस बार चिराग को बेहद मजबूती दी और परिणाम सामने है.
चिराग को कम आंकने की गलती विपक्ष को भारी पड़ी
महागठबंधन को आज सबसे ज्यादा अफसोस इसी बात का है कि उन्होंने चिराग को गंभीरता से नहीं लिया. उन्हें लगा था कि चिराग इस बार बस कैम्पेनर बनकर रह जाएंगे लेकिन चिराग ने साबित कर दिया कि वे न सिर्फ सीटें जिताने की क्षमता रखते हैं, बल्कि कई सीटों पर माहौल बदलने की ताकत भी रखते हैं. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि एनडीए की इस प्रचंड जीत में चिराग की भूमिका निर्णायक है, और विपक्ष की गलतफहमी ही उनके बड़े अंतर की हार की वजह बनी.
चिराग का दौर शुरू, चर्चा पटना से दिल्ली तक
इन चुनावी नतीजों ने साफ कर दिया है कि चिराग पासवान अब सिर्फ पासवान समाज या एक छोटे गठबंधन नेता नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के नए सेंटर पॉइंट हैं. एनडीए के भीतर उनकी ताकत बढ़ चुकी है और यह स्ट्राइक रेट उन्हें सीधे मोदी के सबसे भरोसेमंद चेहरों में खड़ा करता है. पटना से लेकर दिल्ली तक एक ही बात कही जा रही है चिराग ने इस बार ऐसी पारी खेली है जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी. उनकी ये जीत सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि एक नई राजनीतिक लहर की शुरुआत है.