CJI BR Gavai recuses: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस डी.वाई. गवई ने जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है. यह याचिका उस इन-हाउस जांच रिपोर्ट को चुनौती देती है जिसमें वर्मा को उनके आधिकारिक आवास से भारी मात्रा में नकदी बरामद होने के मामले में दोषी ठहराया गया था. CJI गवई ने कहा कि वे उस कॉलेजियम का हिस्सा थे जिसने वर्मा की नियुक्ति की थी, इसलिए उनके लिए इस मामले की सुनवाई करना उचित नहीं होगा. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मामले की त्वरित सुनवाई की मांग की, जिस पर CJI ने कहा कि अब इस याचिका पर सुनवाई के लिए नई पीठ गठित की जाएगी.
क्या है विवाद का पूरा मामला?
मार्च 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने की घटना हुई थी. इस दौरान आवास के एक स्टोर रूम से बड़ी मात्रा में अधजली नकदी बरामद हुई. इसके बाद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागु की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने इस मामले की गहराई से पड़ताल की. दस दिन तक चली जांच में 55 गवाहों से पूछताछ और घटनास्थल का निरीक्षण किया गया. रिपोर्ट में कहा गया कि वर्मा और उनके परिवार का उस स्टोर रूम पर सीधा या परोक्ष नियंत्रण था, जहां से नकदी बरामद हुई, और इसे गंभीर दुराचार बताया गया.
जस्टिस वर्मा की आपत्ति और संसद में महाभियोग प्रस्ताव
जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर जांच समिति की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि रिपोर्ट पूर्वाग्रह से ग्रसित थी और उन्हें अपने पक्ष में सफाई देने का पूरा मौका नहीं दिया गया. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि समिति के निष्कर्ष पहले से तय कहानी पर आधारित है. इस बीच, 208 सांसदों (145 लोकसभा व 63 राज्यसभा) ने वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर उसे संसद के दोनों सदनों के प्रमुखों को सौंपा है. इसमें कांग्रेस, बीजेपी और अन्य दलों के वरिष्ठ नेता शामिल हैं. यह प्रस्ताव संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 218 के तहत दाखिल किया गया है, जिसके तहत किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए संसद में विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है.