CJI BR Gavai: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने 47 साल पुराने मथुरा रेप केस के फैसले को भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का शर्मनाक क्षण बताया है। उन्होंने कहा कि 1978 में कोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले से जनता का भरोसा हिला था। यह वही मामला था जिसमें दो पुलिसकर्मियों पर हिरासत में एक नाबालिग आदिवासी लड़की से बलात्कार का आरोप लगा था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव में दोनों को बरी कर दिया था। उस समय कोर्ट ने यह कहते हुए फैसला सुनाया था कि पीड़िता की सहमति के खिलाफ़ यौन संबंध का ठोस प्रमाण नहीं मिला।
फैसले ने जगाया न्यायिक सुधार का आंदोलन
मथुरा रेप केस के फैसले ने पूरे देश में भारी आक्रोश पैदा किया था। समाज के विभिन्न वर्गों, महिला संगठनों और कानूनविदों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को अन्यायपूर्ण बताया। इस मामले के विरोध ने भारत में महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक नया आंदोलन खड़ा किया। इसी सामाजिक दबाव के बाद 1983 में भारतीय दंड संहिता में संशोधन कर बलात्कार कानून को कड़ा किया गया। हिरासत में बलात्कार (कस्टोडियल रेप) को विशेष अपराध माना गया और पीड़िता के चरित्र को सबूत के रूप में स्वीकार करने पर रोक लगाई गई।
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सहमति की परिभाषा बदली
सीजेआई गवई ने कहा कि मथुरा केस के बाद देश में ‘सहमति’ की कानूनी परिभाषा बदली और न्याय प्रणाली ने अपने दृष्टिकोण को संवेदनशील बनाया। उन्होंने कहा कि यह फैसला भले ही एक संस्थागत शर्म थी, लेकिन इससे न्याय व्यवस्था में आवश्यक सुधारों की राह खुली। उन्होंने लोगों की सतर्कता और महिला संगठनों के संघर्ष को भी सराहा, जिन्होंने अदालतों को जवाबदेह बनाए रखा। सीजेआई के बयान के बाद यह केस एक बार फिर चर्चा में है, जिसने भारत में महिला सुरक्षा कानूनों की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।