
Judicial Appointments India-न्यायिक नियुक्तियों में केंद्र की निष्क्रियता पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता, असाधारण वकीलों ने वापस ली सहमति। भारत के मुख्य न्यायाधीश भूषण आर. गवई ने न्यायिक नियुक्तियों में हो रही देरी पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि वे प्रशासनिक स्तर पर केंद्र सरकार से लगातार अनुरोध कर रहे हैं कि कॉलेजियम की सिफारिशों पर समय पर कार्रवाई की जाए। उनकी नाराजगी उस समय सामने आई जब वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कॉलेजियम द्वारा दोहराई गई सिफारिशों के बावजूद वर्षों से लंबित नियुक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका प्रस्तुत की।
असाधारण प्रतिभाएं हुईं हताश, महिला वकील ने नाम वापस लिया
मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट के लिए अनुशंसित की गईं श्वेताश्री मजूमदार नामक एक असाधारण महिला वकील ने लगभग एक साल तक इंतजार करने के बाद हाल ही में अपनी सहमति वापस ले ली। उनके साथ ही बॉम्बे हाईकोर्ट के लिए अनुशंसित वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश दातार ने भी लंबी चुप्पी और अपारदर्शिता के चलते अपना नाम वापस ले लिया।
27 नाम अभी भी लंबित, बार-बार चेतावनी के बावजूद कार्यपालिका उदासीन
फिलहाल कॉलेजियम द्वारा सुझाए गए कम से कम 27 नाम लंबित हैं, जिनमें चार महिला वकील भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि कार्यपालिका अनिश्चितकाल तक नामों को अधर में नहीं रख सकती। 2 जुलाई को कॉलेजियम ने 36 नामों को मंजूरी दी थी, लेकिन अब तक सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया।
कृपाल का साहसिक बयान: “मैं नाम वापस नहीं लूंगा”
वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल, जिनका नाम केंद्र द्वारा उनके यौन रुझान और साथी की राष्ट्रीयता के कारण अटकाया गया, उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर खड़े हैं और किसी भी दबाव में अपनी सहमति वापस नहीं लेंगे।
न्यायपालिका की गरिमा दांव पर
इस पूरे घटनाक्रम ने न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता, समयबद्धता और कार्यपालिका की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश की स्पष्ट प्रतिक्रिया से संकेत मिलता है कि अब देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और सुप्रीम कोर्ट संस्थागत गरिमा की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।