सुप्रीम कोर्ट में एक्स-पोस्ट फैक्टो पर्यावरणीय मंजूरी (EC) को लेकर दायर याचिका पर गुरुवार को तीखी बहस देखने को मिली। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कांग्रेस सांसद जयराम रमेश की रिट पिटीशन पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने न सिर्फ याचिका पर सवाल उठाए, बल्कि सख्त टिप्पणियां करते हुए संभावित जुर्माने की चेतावनी भी दे डाली।
क्या है पूरा मामला?
राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने केंद्र सरकार के उस कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें एक्स-पोस्ट फैक्टो पर्यावरणीय मंजूरी को लागू करने का प्रावधान शामिल है। यह ज्ञापन सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के एक फैसले के आधार पर जारी किया गया था। याचिका में कहा गया था कि ऐसी पूर्वव्यापी मंजूरी पर्यावरण कानूनों की मूल भावना के खिलाफ है।
CJI का तीखा सवाल और नाराजगी
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में पूछा कि जब सर्वोच्च न्यायालय पहले ही वनशक्ति रिव्यू जजमेंट में एक्स-पोस्ट फैक्टो EC को लेकर फैसला दे चुका है, तो उसी आधार पर जारी कार्यालय ज्ञापन को रिट याचिका के जरिए कैसे चुनौती दी जा सकती है? बेंच ने कहा कि इस तरह की याचिका सीधे-सीधे अदालत के फैसले को चुनौती देने के समान है।
“साजिश जानते हैं…” बयान से बढ़ी तल्खी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा, “आप एक जिम्मेदार नेता हैं। अगर यह गलत साबित हुआ तो भारी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहें। हम इसके पीछे की साजिश जानते हैं।” कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद माहौल और गंभीर हो गया। बेंच ने यह भी संकेत दिया कि ऐसी याचिकाएं केवल मीडिया में सुर्खियां बटोरने के उद्देश्य से दाखिल की जा सकती हैं।
जुर्माने की चेतावनी और याचिका वापसी
जब अदालत ने भारी जुर्माना लगाने की संभावना जताई, तो याचिकाकर्ता की ओर से याचिका वापस लेने का निर्णय लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी को पूर्व फैसले से आपत्ति है तो उसका समाधान विधिक प्रक्रिया के तहत पुनर्विचार याचिका या अन्य वैधानिक उपायों से किया जाना चाहिए, न कि नई रिट पिटीशन दाखिल कर।
एक्स-पोस्ट फैक्टो EC क्या है?
एक्स-पोस्ट फैक्टो पर्यावरणीय मंजूरी उन परियोजनाओं को दी जाती है, जो बिना पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति के शुरू हो चुकी हों। सामान्यतः कानून के तहत किसी भी बड़ी परियोजना को शुरू करने से पहले पर्यावरणीय मंजूरी अनिवार्य होती है। इसी प्रावधान को लेकर लंबे समय से कानूनी और पर्यावरणीय बहस जारी है।