CJIs Important Appeal: भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि कानूनी पेशे और न्यायिक व्यवस्था में संतुलित प्रतिनिधित्व के लिए संस्थागत स्तर पर सुधार जरूरी हैं। उनका मानना है कि महिला वकीलों को जज बनाए जाने की प्रक्रिया को अपवाद की तरह नहीं बल्कि एक सामान्य नियम की तरह देखा जाना चाहिए, ताकि न्यायपालिका अधिक संतुलित और समावेशी बन सके।
प्रतिनिधित्व पर जोर
एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि महिलाएं किसी विशेष रियायत की मांग नहीं कर रहीं, बल्कि उन्हें उचित और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक इस सच्चाई को स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक न्यायपालिका में संतुलित भागीदारी का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल रहेगा।
दायरा बढ़ाने की सलाह
सीजेआई ने हाई कोर्ट कॉलेजियम से आग्रह किया कि वे जजों की नियुक्ति के लिए महिला वकीलों पर गंभीरता से विचार करें। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्यों से जुड़े वे महिला अधिवक्ता जो सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रही हैं, उन्हें भी संभावित उम्मीदवारों के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।
यह भी देखेंःमिडिल ईस्ट तनाव पर अन्ना हजारे की पीएम मोदी से अपील, कहा—भारत बने वैश्विक शांति पहल का नेतृत्वकर्ता
तभी होगा स्थायी बदलाव
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर सुधार को स्थायी बनाना है तो उसे संस्थागत ढांचे का हिस्सा बनाना होगा। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व किसी एक व्यक्ति के प्रयासों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरी व्यवस्था में निष्पक्षता और संतुलन सुनिश्चित करने की सोच शामिल होनी चाहिए।
मजबूत हो रही नींव
उन्होंने बताया कि जिला स्तर की न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में लगभग 36 प्रतिशत न्यायिक अधिकारी महिलाएं हैं, जो भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत है। कई हाई कोर्ट में भी महिला जजों की संख्या बढ़ रही है, जिससे न्यायपालिका में संतुलित प्रतिनिधित्व की दिशा में उम्मीद मजबूत होती दिखाई दे रही है।