कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की शुरुआत सोशल मीडिया पर एक अभियान के रूप में हुई। बाद में यह बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं, कथित पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित आंदोलन में बदल गया। हाल के परीक्षा विवादों के बाद बड़ी संख्या में छात्र और युवा इससे जुड़े। संगठन ने परीक्षा प्रणाली में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे जैसी मांगें उठाईं।
धरने से अनशन तक का सफर
20 जून को जंतर-मंतर पर CJP ने प्रदर्शन शुरू किया। शुरुआती धरना बाद में अनिश्चितकालीन आंदोलन में बदल गया। इसी दौरान पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी आंदोलन में शामिल हुए और उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की। उनके जुड़ने के बाद आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा समर्थन और चर्चा मिली। बाद में उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया।
संसद मार्च का फैसला कैसे हुआ?
8 जुलाई को सोनम वांगचुक ने 20 जुलाई को संसद मार्च का आह्वान किया। इसके बाद CJP ने भी समर्थकों से बड़ी संख्या में दिल्ली पहुंचने की अपील की। आंदोलन के दौरान अभिजीत दीपके ने भी अनशन शुरू किया, जिसे बाद में वांगचुक के अनुरोध पर समाप्त कर दिया गया। संसद मार्च से पहले छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्ष के कई नेताओं ने आंदोलन का समर्थन किया।
20 जुलाई को क्या हुआ?
20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हजारों प्रदर्शनकारी जुटे और संसद की ओर मार्च शुरू किया। पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कई जगह बैरिकेडिंग की। मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़े। कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने की भी खबरें सामने आईं। इसी बीच CJP ने दावा किया कि सरकार बातचीत के लिए तैयार है।
पहले भी कई आंदोलनों का दिखा असर
भारत में इससे पहले भी कई बड़े आंदोलन संसद तक पहुंचे या संसद पर असर डालने में सफल रहे हैं। किसान आंदोलन के बाद तीन कृषि कानून वापस लिए गए। अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद लोकपाल कानून बना। निर्भया आंदोलन के बाद आपराधिक कानूनों में बदलाव हुए। वहीं CAA विरोध प्रदर्शन और वन रैंक वन पेंशन जैसे आंदोलनों ने भी राष्ट्रीय बहस को प्रभावित किया, हालांकि सभी मांगें पूरी नहीं हो सकीं।
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अब आगे क्या होगा?
फिलहाल CJP का आंदोलन जारी है और सरकार के साथ बातचीत को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। प्रदर्शनकारियों की मांगों पर सरकार क्या फैसला लेती है और संसद में इस मुद्दे पर आगे क्या चर्चा होती है, इस पर सभी की नजर बनी हुई है। आंदोलन का अंतिम परिणाम आने वाले दिनों में सरकार, प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच होने वाली बातचीत और फैसलों पर निर्भर करेगा।