मध्य प्रदेश कांग्रेस एक बड़े मुद्दे को लेकर सड़क पर है, लेकिन पार्टी के भीतर एकजुटता की तस्वीर साफ नहीं दिख रही। इंदौर के भागीरथपुरा प्रकरण ने कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को उजागर कर दिया है। एक धड़ा लगातार प्रदर्शन, दौरे और आंदोलन में सक्रिय है, जबकि कई वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता पूरी तरह चुप नजर आ रहे हैं। राहुल गांधी के संभावित दौरे से पहले यह स्थिति और ज्यादा चर्चा में आ गई है।
एक खेमा आक्रामक, दूसरा खामोश
भागीरथपुरा मामले को लेकर कांग्रेस का एक समूह पूरी ताकत के साथ मैदान में है। प्रदेश नेतृत्व से लेकर विधानसभा में विपक्ष के नेता तक लगातार इंदौर में सक्रिय रहे। दो दिन तक शहर में डटे रहने से यह साफ हो गया कि पार्टी का यह धड़ा इस मुद्दे को सरकार के खिलाफ बड़ा हथियार बनाना चाहता है।
कौन दिखा सक्रिय, कौन रहा दूर
पूर्व मंत्री, शहर और जिला स्तर के कई नेता लगातार धरना, प्रदर्शन और बैठकों में नजर आ रहे हैं। वहीं, पार्टी के कुछ पुराने और प्रभावशाली चेहरे पूरी तरह नदारद हैं। न तो वे घटनास्थल पर पहुंचे और न ही कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई, जिससे अंदरूनी मतभेदों की चर्चा तेज हो गई है।
वरिष्ठ नेताओं की चुप्पी बनी सवाल
पार्टी के लिए असहज स्थिति तब बनी, जब प्रदेश के बड़े और अनुभवी नेता भी इस मुद्दे से दूरी बनाए दिखे। न उनके दौरे हुए और न कोई बड़ा बयान आया। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या कांग्रेस इस संवेदनशील मुद्दे पर पूरी तरह एकजुट है।
युवा कांग्रेस का सात दिन का सत्याग्रह
भागीरथपुरा प्रकरण को लेकर युवा कांग्रेस ने आंदोलन तेज करने का ऐलान किया है। 9 जनवरी से 15 जनवरी तक इंदौर के प्रमुख चौराहे पर रोजाना शांतिपूर्ण सत्याग्रह किया जाएगा। दूषित पानी से हुई मौतों के विरोध में यह प्रदर्शन सुबह से शाम तक चलेगा, जिसमें प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के युवा नेता शामिल होंगे।
राहुल गांधी को इंदौर लाने की कोशिशें
इस मामले पर राहुल गांधी पहले ही अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं। अब उन्हें इंदौर लाने की तैयारी तेज हो गई है, ताकि मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जा सके। प्रदेश नेतृत्व के कुछ नेताओं ने दिल्ली जाकर इस संबंध में चर्चा की है, हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं की जा रही है।
अंदरूनी राजनीति या रणनीतिक चुप्पी?
भागीरथपुरा मामला कांग्रेस के लिए सरकार को घेरने का बड़ा अवसर माना जा रहा है, लेकिन पार्टी के भीतर की खामोशी और सक्रियता के फर्क ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। राहुल गांधी के संभावित दौरे से पहले यह गुटबाजी पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है।