
प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को जेल जाने की स्थिति में पद से बर्खास्त करने वाले संविधान संशोधन विधेयक को लेकर राजनीति तेज हो गई है. इस विधेयक को सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन अब विपक्षी दल इसमें शामिल होने से इनकार करने लगे हैं. तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बाद अब शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) ने भी जेपीसी से किनारा कर लिया है.
शिवसेना का हमला
शिवसेना (उद्धव गुट) के नेता संजय राउत ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस विधेयक और जेपीसी को लेकर तीखा हमला किया. उन्होंने लिखा कि मोदी सरकार लोकतंत्र और जनता द्वारा चुनी गई सरकार को कुचलने के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाई है. राउत ने इसे “130वां संविधान संशोधन विधेयक” बताते हुए कहा कि इस पर समीक्षा के नाम पर जेपीसी का गठन केवल एक नौटंकी है. उन्होंने साफ कहा कि उद्धव ठाकरे और उनकी पार्टी ऐसी किसी समिति का हिस्सा नहीं बनेंगे.
तृणमूल और सपा पहले ही कर चुकी हैं इनकार
शिवसेना से पहले ही तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने संयुक्त समिति में भाग लेने से इनकार कर दिया था. तृणमूल का कहना था कि जेपीसी अब पहले जैसी प्रभावी संस्था नहीं रही है, बल्कि सरकारें इसका इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए करने लगी हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेता डेरेक ओब्रायन ने कहा कि 2014 से पहले जेपीसी को जवाबदेही तय करने वाला मंच माना जाता था, लेकिन अब इसकी भूमिका खोखली हो गई है.
वहीं समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस विधेयक को ही गलत बताया. उन्होंने कहा कि जब खुद गृह मंत्री अमित शाह ने स्वीकार किया है कि उनके ऊपर झूठे आरोप लगाए गए थे, तो फिर कोई भी व्यक्ति किसी पर फर्जी केस करवा सकता है. ऐसे में यह बिल पूरी तरह बेकार है और इसका कोई औचित्य नहीं बनता. इसलिए सपा ने भी जेपीसी में अपने सांसद नहीं भेजने का फैसला किया है.
इसे भी पढ़ें : क्या BJP लगाएगी Pooja Pal के जरिए Akhilesh के PDA फॉर्मूले पर सेंध, क्यों उठे सवाल, पढ़ें एक क्लिक में
संसद में मचा हंगामा
गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार को लोकसभा में संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025 पेश किया था. बिल के मुताबिक अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं और वह लगातार 30 दिन तक जेल में रहते हैं, तो उनका पद अपने आप खत्म हो जाएगा.
बिल पेश किए जाने के दौरान लोकसभा में विपक्षी सांसदों ने जमकर हंगामा किया. इतना ही नहीं एक सांसद ने तो बिल की कॉपी फाड़कर गृह मंत्री अमित शाह की ओर फेंकने की कोशिश भी की. माहौल काफी गरमा गया और भारी विरोध के बीच यह बिल आगे की प्रक्रिया के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया.
जेपीसी का क्या है स्वरूप?
अब इस बिल की जांच के लिए 31 सदस्यों की एक संयुक्त संसदीय समिति बनाई जाएगी. इसमें 21 सांसद लोकसभा से और 10 सांसद राज्यसभा से होंगे. समिति को इस बिल की विस्तृत समीक्षा करके शीतकालीन सत्र तक अपनी रिपोर्ट संसद में देनी होगी. हालांकि, लगातार तीन बड़ी पार्टियों तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अब शिवसेना (उद्धव गुट) के समिति से बाहर होने के बाद विपक्ष की साझा रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं. विपक्ष का कहना है कि यह समिति सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए है और असल में सरकार पहले से ही तय एजेंडे पर चल रही है. ऐसे में जेपीसी में शामिल होना बेकार है.
स्पष्ट है कि यह विधेयक सिर्फ कानूनी ही नहीं, बल्कि राजनीतिक विवाद का भी बड़ा मुद्दा बन चुका है. जहां सरकार इसे भ्रष्टाचार और अपराध से राजनीति को दूर रखने का कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे लोकतंत्र कुचलने वाला फैसला बता रहा है. अब देखना होगा कि जेपीसी अपनी रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष देती है और इस बिल का भविष्य क्या होता है.