
केंद्र सरकार एक नया संविधान संशोधन बिल लेकर आ रही है. इस बिल के अनुसार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्री, अगर तीस दिन से ज्यादा न्यायिक हिरासत में रहते हैं, तो अपने पद से स्वतः बर्खास्त हो जाएंगे. यह बिल संवैधानिक और राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे संसद में पास कराना सरकार के लिए आसान नहीं होगा. विपक्ष इस बिल का कड़ा विरोध कर रहा है. उसका कहना है कि यह बिल संघीय ढांचे के खिलाफ है और असंवैधानिक भी है. विपक्ष का तर्क है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में ‘जब तक दोष साबित न हो, तब तक कोई दोषी नहीं माना जाएगा’. विपक्ष यह भी कह रहा है कि सरकार इस बिल के जरिए विपक्ष के शासन वाले राज्यों में सरकारों को अस्थिर करना चाहती है. पिछले 11 साल का रिकॉर्ड भी दिखाता है कि जांच एजेंसियों का दुरुपयोग अक्सर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए हुआ है.
बिल पास कराना सरकार के लिए चुनौती!
संविधान संशोधन बिल को पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत चाहिए. संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार, हर सदन में दो तरह के बहुमत की जरूरत होती है. पहला, कुल सदस्यों का बहुमत, यानी सदन में कुल सदस्य संख्या का 50% से अधिक. दूसरा, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत. उदाहरण के लिए, लोकसभा में अभी 542 सदस्य हैं. कुल बहुमत के लिए कम से कम 272 सांसदों का समर्थन जरूरी है. अगर सभी सांसद मौजूद और मतदान करते हैं, तो दो-तिहाई बहुमत के लिए कम से कम 361 सांसदों का समर्थन चाहिए. राज्यसभा में 239 सदस्य हैं. कुल बहुमत के लिए कम से कम 120 और दो-तिहाई बहुमत के लिए 160 सांसदों का समर्थन जरूरी है. हालांकि, वर्तमान स्थिति में यह आंकड़ा सरकार के लिए चुनौती है. एनडीए के पास लोकसभा में 293 और राज्यसभा में 132 सांसद हैं. इस हिसाब से देखा जाए तो यह संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत से कम है. कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का समर्थन न मिलने पर इसे पास कराना मुश्किल होगा. संविधान संशोधन सिर्फ संसद से ही नहीं, बल्कि राज्यों से भी अनुमोदन का हक मांगता है. यह इसलिए जरूरी है क्योंकि यह बिल संघीय ढांचे को प्रभावित करता है. कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं में साधारण बहुमत से इसका समर्थन होना जरूरी है. अधिकांश राज्यों में एनडीए की सरकार होने के कारण इस स्तर पर ज्यादा दिक्कत नहीं होगी.
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सरकार के लिए फायदेमंद है बिल!
राजनीतिक दृष्टि से यह बिल सरकार के लिए फायदे भी रखता है. अगर विपक्ष इसका विरोध करता है, तो सरकार इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई में उनकी अनिच्छा के रूप में दिखा सकती है. इससे सरकार विपक्ष पर दबाव बना सकती है और खुद को नैतिकता और शुचिता की स्थिति में प्रस्तुत कर सकती है. बिल संसद में आने से पहले ही संयुक्त संसदीय समिति को भेजा जा रहा है. कहा जा रहा है कि समिति शीतकालीन सत्र के पहले दिन अपनी रिपोर्ट देगी. विपक्ष की भागीदारी महत्वपूर्ण होगी. समिति में विपक्ष संशोधन के सुझाव दे सकता है, जैसे कि ‘न्यायिक हिरासत’ की जगह ‘सजा होने पर इस्तीफा’ की शर्त. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार वर्तमान में दो साल या उससे अधिक की सजा होने पर सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है. ऐसे कई मुद्दे समिति में उठ सकते हैं.
विपक्ष लगा रहा राजनीतीकरण का आरोप
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बिल केवल कानूनी बदलाव नहीं है, बल्कि राजनीतिक रणनीति का भी हिस्सा है. सरकार ने इसे पेश करने से पहले अपने राजनीतिक लाभ और नुकसान का विश्लेषण जरूर किया होगा. संक्षेप में कहा जा सकता है कि ये बिल संसद में पास कराना चुनौतीपूर्ण है. इसके लिए व्यापक राजनीतिक सहमति जरूरी है. बिना विपक्ष के समर्थन के इसे पारित कराना लगभग असंभव है. फिर भी इसके जरिए सरकार विपक्ष पर भ्रष्टाचार और नैतिकता के सवाल खड़े कर सकती है. संसद और राज्यों में बहुमत हासिल करने के लिए सरकार को रणनीति और राजनीतिक कौशल दोनों की जरूरत होगी. यह बिल न केवल संवैधानिक बदलाव का संकेत है, बल्कि आगामी राजनीतिक लड़ाई में भी इसकी अहम भूमिका होगी.