Copper Supply Crisis : सोने की बढ़ती कीमतों के बीच अब तांबे की आपूर्ति को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, तांबे की नई खदानों को तैयार करने में लंबा समय लगना भविष्य में सप्लाई के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। किसी खदान की खोज से लेकर वहां उत्पादन शुरू होने तक 16 साल से भी ज्यादा समय लग सकता है। इस वजह से मांग बढ़ने पर भी बाजार में तुरंत अतिरिक्त तांबा उपलब्ध कराना आसान नहीं होगा। हालांकि, कीमतों में कितनी तेजी आएगी, यह मांग, उत्पादन और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
नई खदानों का विकास बेहद धीमा
रिपोर्ट के अनुसार, तांबे की खदान विकसित करने की प्रक्रिया में खोज, मंजूरी, निर्माण और उत्पादन शुरू करने जैसे कई चरण शामिल होते हैं। इन सभी में लंबा समय लगने के कारण ऊंची कीमतों का असर भी तुरंत नई सप्लाई के रूप में दिखाई नहीं देता। चिंता यह है कि 2030 के आसपास मौजूदा खदानों से उत्पादन घटने की आशंका के बीच नई परियोजनाएं समय पर तैयार नहीं हुईं, तो बाजार में उपलब्ध तांबे पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में केवल कीमतों में बढ़ोतरी से निकट भविष्य में आपूर्ति की कमी दूर करना मुश्किल हो सकता है।
कमी को बताया संरचनात्मक संकट
गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषण में तांबे की संभावित कमी को केवल अस्थायी उतार-चढ़ाव के बजाय संरचनात्मक समस्या के रूप में देखा गया है। इसका मतलब है कि चुनौती के पीछे खदानों की सीमित उपलब्धता, नई परियोजनाओं में देरी और उत्पादन बढ़ाने की मुश्किलें जैसे लंबे समय से जुड़े कारण हैं। ऐसी स्थिति में बाजार उन कंपनियों और परियोजनाओं को ज्यादा महत्व दे सकता है, जिनके पास तांबे का उत्पादन बढ़ाने की वास्तविक क्षमता है। हालांकि, कीमतों की दिशा पर वैश्विक मांग, आर्थिक गतिविधियों और खनन कंपनियों के निवेश का भी असर पड़ेगा।
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बड़ी खोजों में आई गिरावट
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 1990 के दशक के बाद से तांबे के बड़े नए भंडार मिलने की रफ्तार में कमी आई है। इसके साथ ही कई खदानों में अयस्क की गुणवत्ता यानी ग्रेड भी घटा है। खासकर दक्षिण अमेरिका के कुछ प्रमुख खनन क्षेत्रों में यह चुनौती महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जब अयस्क में तांबे की मात्रा कम होती है, तो समान उत्पादन हासिल करने के लिए ज्यादा चट्टानों का खनन और प्रसंस्करण करना पड़ सकता है। इससे ऊर्जा, पानी और परिचालन पर होने वाला खर्च बढ़ सकता है।
महंगी परियोजनाएं बढ़ा सकती हैं जोखिम
नई खदानों के लिए अब कई बार दूरदराज के इलाकों में परियोजनाएं विकसित करनी पड़ती हैं। वहां सड़क, बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाएं तैयार करने में अतिरिक्त निवेश की जरूरत होती है। इससे निर्माण लागत बढ़ती है और परियोजनाओं को शुरू होने में देरी भी हो सकती है। दूसरी ओर, बिजली नेटवर्क, इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़ी तकनीकों में तांबे की मांग महत्वपूर्ण बनी हुई है। यदि मांग बढ़ती रही और उत्पादन उसके अनुरूप नहीं बढ़ा, तो कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। फिर भी तांबे का सोने जितना महंगा होना तय नहीं है; इसका वास्तविक भाव आने वाले वर्षों में आपूर्ति और मांग के संतुलन से निर्धारित होगा।