मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक तेल बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। करीब 4 साल बाद क्रूड ऑयल 100 डॉलर के पार पहुंच गया और लगभग 114 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। इसके साथ ही खाड़ी क्षेत्र के अहम समुद्री रास्ते स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। अगर इस रास्ते पर आपूर्ति प्रभावित होती है तो दुनिया भर के देशों पर इसका असर पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। माना जाता है कि देश की लगभग 90 प्रतिशत तेल जरूरतें विदेशों से पूरी होती हैं। ऐसे में अगर वैश्विक बाजार में तेल महंगा होता है तो भारत पर भी इसका असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतों में तेजी आने से परिवहन लागत बढ़ती है और धीरे-धीरे कई जरूरी चीजों की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए मिडिल ईस्ट की स्थिति को भारत समेत कई देश ध्यान से देख रहे हैं।
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वित्त मंत्री ने महंगाई को लेकर क्या कहा
इस पूरे मुद्दे पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि फिलहाल देश में वस्तुओं की कीमतें काफी हद तक स्थिर बनी हुई हैं। उनके अनुसार कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर महंगाई पर बहुत ज्यादा पड़ने की संभावना नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं ताकि आम लोगों पर ज्यादा बोझ न पड़े।
तेल बाजार में तेजी के पीछे क्या कारण
दरअसल पश्चिम एशिया में हाल ही में हुए घटनाक्रम के बाद तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक खाड़ी क्षेत्र के कुछ तेल निर्यातक देशों ने सुरक्षा कारणों से अपने शिपमेंट में कटौती की घोषणा भी की है। इसके अलावा क्षेत्र में राजनीतिक तनाव भी बढ़ गया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ी है। हालांकि सरकार का कहना है कि भारत के पास ऊर्जा जरूरतों को संभालने के लिए कई विकल्प मौजूद हैं और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।