दुनिया में बढ़ते तनाव का असर अब ऊर्जा बाजार पर भी साफ दिखाई देने लगा है। हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखी गई है। सोमवार को क्रूड ऑयल की कीमत करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इससे दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तनाव लंबे समय तक बना रहा तो तेल की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है। इसी वजह से लोगों को उस समय की भी याद आने लगी है जब कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थीं।
जब 147 डॉलर तक पहुंच गया था तेल
दुनिया में एक समय ऐसा भी आया था जब क्रूड ऑयल की कीमत 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। यह साल 2008 का दौर था। उस समय तेल के दाम इतिहास के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए थे। हैरानी की बात यह थी कि उस समय कोई बड़ा युद्ध भी नहीं चल रहा था। इसके बावजूद तेल की कीमतें लगातार बढ़ती चली गईं और वैश्विक बाजार में भारी उथल-पुथल देखने को मिली।
2003 से शुरू हुई थी तेजी
ऊर्जा से जुड़े आंकड़ों के अनुसार तेल की कीमतों में तेजी अचानक नहीं आई थी। साल 2003 में क्रूड ऑयल की कीमत लगभग 30 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी। इसके बाद अगले कुछ वर्षों में कीमतें लगातार बढ़ती गईं। 2008 की शुरुआत तक यह कीमत 100 डॉलर से ऊपर पहुंच गई। यह तेजी दिखाती है कि उस समय दुनिया भर में ऊर्जा की मांग कितनी तेजी से बढ़ रही थी।
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भारत और चीन की मांग बनी वजह
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह दुनिया की बढ़ती ऊर्जा जरूरतें थीं। भारत और चीन जैसे देशों में तेजी से उद्योग बढ़ रहे थे और आर्थिक गतिविधियां भी तेजी पकड़ रही थीं। इससे तेल की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई। लेकिन उत्पादन उसी गति से नहीं बढ़ पाया। मांग ज्यादा और आपूर्ति कम होने से कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक था।
डॉलर और बाजार का भी पड़ा असर
उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की कीमत में गिरावट भी देखी गई थी। डॉलर कमजोर होने से कई देशों के लिए तेल खरीदना अपेक्षाकृत आसान हो गया था। इससे मांग और बढ़ गई। साथ ही कमोडिटी बाजार में निवेश भी तेजी से बढ़ रहा था। कई बड़े निवेशक और फंड तेल के सौदों में पैसा लगा रहे थे, जिससे कीमतों में और तेजी आई।
निवेशकों की भूमिका भी रही अहम
विशेषज्ञों का मानना है कि उस दौर में फाइनेंशियल मार्केट की गतिविधियों ने भी कीमतों को ऊपर पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई। तेल से जुड़े फ्यूचर्स बाजार में निवेशकों की भागीदारी बढ़ गई थी। हेज फंड और बड़े निवेशकों के भारी निवेश ने बाजार में तेजी को और तेज कर दिया। इसी कारण कुछ ही समय में तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गईं और वैश्विक बाजार में बड़ी हलचल देखने को मिली।