Crude Oil Prices : अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। सोमवार को कच्चे तेल का भाव 103 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया, जो पिछले चार महीनों का सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और सप्लाई से जुड़े जोखिमों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। पिछले सप्ताह ही कच्चे तेल की कीमतों में 9 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
सऊदी अरब का बड़ा फैसला
तेजी की सबसे बड़ी वजह सऊदी अरब की प्रमुख ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का बंद होना माना जा रहा है। ड्रोन हमलों के बाद सऊदी अरब ने इस पाइपलाइन का संचालन रोक दिया है। यह पाइपलाइन लाल सागर के बंदरगाहों तक तेल पहुंचाने का महत्वपूर्ण मार्ग है और इसकी क्षमता लगभग 70 लाख बैरल प्रतिदिन बताई जाती है। इसके बंद होने से वैश्विक सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ा संकट
दूसरी ओर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। इस मार्ग से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल और गैस की आपूर्ति होती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अस्थायी शिपिंग कॉरिडोर बनाने को लेकर ईरान और खाड़ी देशों के बीच प्रस्तावित बातचीत टल गई है। सऊदी अरब ने सुरक्षा चिंताएं जताई हैं, जबकि बहरीन ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया है। इससे बाजार में सप्लाई बाधित होने की आशंका और बढ़ गई है।
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ब्रेंट क्रूड 107 डॉलर के पार
सोमवार सुबह अंतरराष्ट्रीय बाजार में डब्ल्यूटीआई क्रूड 102.8 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा। वहीं ब्रेंट क्रूड 107 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया। लगातार बढ़ती कीमतों ने निवेशकों और ऊर्जा आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है। भारत जैसे देशों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है।
भारत पर कितना पड़ेगा असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल है। ऐसे में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से आयात बिल बढ़ सकता है। यदि यह तेजी लंबे समय तक बनी रहती है तो पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और परिवहन लागत पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा महंगा ईंधन महंगाई को भी बढ़ावा दे सकता है, क्योंकि परिवहन और उत्पादन की लागत बढ़ जाती है।
शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकती हैं। ऊर्जा आयात पर बढ़ता खर्च चालू खाते के घाटे और रुपये पर भी दबाव डाल सकता है। बाजार विश्लेषकों के अनुसार यदि यह तेजी जारी रहती है तो निवेशकों की चिंता बढ़ सकती है और वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।