क्या आपने कभी अपने जेब में रखे नोटों को गौर से देखा है? क्या आपने सोचा है कि इन नोटों का खास और मजबूत कागज आखिर बनता कहां है? इसका जवाब है – मध्यप्रदेश का नर्मदापुरम शहर। देश में नोटों के लिए इस्तेमाल होने वाला सुरक्षा कागज केवल यहीं तैयार होता है। नर्मदापुरम की यह फैक्ट्री वर्षों से देश की आर्थिक व्यवस्था की नींव को मजबूत कर रही है। यहां से बने पेपर को नासिक और देवास की प्रिंटिंग प्रेस में भेजा जाता है, जहां ये नोट का रूप लेते हैं। यही वजह है कि इस फैक्ट्री को देश की मुद्रा आत्मनिर्भरता की पहचान माना जाता है।
पेपर फैक्ट्री का इतिहास और पहचान
नर्मदापुरम की यह ‘प्रतिभूति कागज कारखाना’ (SPM) भारत प्रतिभूति मुद्रण तथा मुद्रा निर्माण निगम लिमिटेड (SPMCIL) का हिस्सा है। 9 मार्च 1967 को मोरारजी देसाई ने इसका उद्घाटन किया था। तब से लेकर अब तक यह कारखाना हर denomination के नोटों के लिए उच्च गुणवत्ता वाला सिक्योरिटी पेपर तैयार कर रहा है। इसमें ऐसी सुरक्षा विशेषताएं होती हैं, जिससे नकली नोट बनाना लगभग नामुमकिन है।
आत्मनिर्भर भारत का सपना यहीं हुआ साकार
आजादी के बाद देश विदेश से कागज आयात करता था, लेकिन नर्मदापुरम में पेपर फैक्ट्री की स्थापना से यह निर्भरता खत्म हुई। यहां की जलवायु, श्रमबल और संसाधनों को देखते हुए यह स्थान सबसे उपयुक्त माना गया। 1962 में इसकी नींव रखी गई और फिर 1967 से इसका संचालन शुरू हुआ।
नोटबंदी में निभाई अहम भूमिका
नोटबंदी के समय देशभर में कैश की मांग अचानक बढ़ गई थी। उस समय नर्मदापुरम फैक्ट्री ने दोगुने उत्पादन के साथ जरूरतें पूरी कीं और देश को नोटों की आपूर्ति सुनिश्चित की। यही नहीं, आधुनिक मशीनें जैसे PM-5 यहां बड़ी मात्रा में कागज बनाने में सक्षम हैं।
आज भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़
वर्तमान में यह फैक्ट्री 10 से लेकर 500 तक के नोटों के लिए पेपर बना रही है। पहले 2000 के नोट का कागज भी यहीं बनता था। अब जब उसकी छपाई बंद है, तो मांग भी नहीं रही। 2006 में इसे एक निगम का रूप दिया गया, जिससे संचालन में और भी दक्षता आई।