Krishna Mata: जीवन की चमक-दमक और उच्च पद को त्यागकर आध्यात्मिक मार्ग चुनने वाली एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है। तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली (त्रिची) की रहने वाली राधेय कृष्णा, जिन्हें अब कृष्णा माता के नाम से जाना जाता है, ने यूपीएससी की कठिन परीक्षा पास कर कस्टम विभाग में ग्रेड-वन अधिकारी के रूप में करियर बनाया था। उन्होंने नौकरी छोड सन्यास ग्रहण कर लिया है। वे पिछले कई वर्षों से प्रयागराज में संगम तट पर कल्पवास कर रही हैं। माघ मेले के दौरान अरैल घाट पर उनका शिविर लगा हुआ है, जहां वे साधना और भक्ति में लीन रहती हैं। कृष्णा माता का कहना है कि भौतिक संसार की चमक-दमक से अलगाव होने के बाद उन्हें ईश्वर की शरण में शांति मिली।
आयंगर ब्राह्मण परिवार से है ताल्लुक
उन्होंने 1994 में अपने तीसरे प्रयास में सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की और आयंगर ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते हुए उच्च पद प्राप्त किया।कृष्णा माता ने लगभग 17 वर्षों तक चेन्नई में कस्टम विभाग में सेवा दी। इस दौरान उन्हें भौतिक सुख-सुविधाएं और सामाजिक प्रतिष्ठा मिली, लेकिन 13 साल पहले (लगभग 2013 में) उनके मन में आध्यात्मिक जिज्ञासा और ईश्वर के प्रति समर्पण इतना गहरा हो गया कि उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया और अपना नाम कृष्णा माता रखा। आज वे महिला अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर के रूप में जानी जाती हैं।
मैंने सच्ची मुक्ति का मार्ग चुना
संन्यास के बाद कृष्णा माता ने अन्न त्याग (अन्नाहार त्याग) कर लिया है और केवल फलाहार पर जीवनयापन कर रही हैं।उन्होंने कहा, नौकरी छोड़कर मैंने सच्ची मुक्ति का मार्ग चुना है। उनकी यह कहानी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी है, जो दिखाती है कि सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी आत्मिक खोज को प्राथमिकता देना कितना महत्वपूर्ण है। प्रयागराज में कल्पवास के दौरान कृष्णा माता भक्तों को आशीर्वाद देती हैं और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। उनकी जीवन यात्रा साबित करती है कि सच्ची खुशी बाहर की चीजों में नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और भक्ति में छिपी है।