Cyber Crime: साइबर अपराध के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए क्राइम ब्रांच की साइबर सेल ने तथाकथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ ठगी गिरोह के दो मुख्य आरोपियों अनीश सिंह और मणि सिंह को गिरफ्तार किया है। आरोपी आम लोगों को पुलिस अधिकारी बनकर डराने, मानसिक रूप से बंधक बनाने और करोड़ों की ठगी करने में संलिप्त पाए गए हैं। जांच में सामने आया है कि आरोपियों से जुड़े बैंक खातों के खिलाफ एनसीआरपी पोर्टल पर 190 से अधिक शिकायतें और एफआईआर दर्ज हैं, जिनमें करीब 100 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी की गई है।
तीन महीने तक डिजिटल कैद में रही पीड़िता
डीसीपी आदित्य गौतम ने बताया कि इस मामले में एक गृहिणी को अक्टूबर 2025 से दिसंबर 2025 तक करीब तीन महीने तक डिजिटल अरेस्ट में रखा गया। खुद को मुंबई साइबर क्राइम का वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी बताने वाले ठग ने पीड़िता पर आधार कार्ड के दुरुपयोग और गंभीर आपराधिक मामलों में शामिल होने का झूठा आरोप लगाया।डर और मानसिक दबाव बनाकर पीड़िता को लगातार फोन और वीडियो कॉल पर निगरानी में रखा गया। उसे अपने परिवार से बात करने तक से मना किया गया और धमकी दी गई कि अगर उसने किसी को बताया तो उसके पति और बेटे को भी झूठे केस में फंसा दिया जाएगा।
40 लाख रुपये की ठगी, सबूत मिटाने का दबाव
लगातार मानसिक प्रताड़ना और धमकियों के चलते पीड़िता ने अपनी जीवनभर की बचत 40 लाख रुपये आरोपियों द्वारा बताए गए खातों में ट्रांसफर कर दी। हर भुगतान के बाद उसे चैट, कॉल लॉग और ट्रांजैक्शन डिलीट करने के निर्देश दिए जाते थे। इसके बावजूद आरोपी फर्जी ‘वेरिफिकेशन’ और रिफंड का झांसा देकर उसे मानसिक रूप से नियंत्रित करते रहे। अंततः पीड़िता ने साहस जुटाकर शिकायत दर्ज कराई, जिस पर ई-एफआईआर संख्या 60001703/2025 क्राइम ब्रांच में दर्ज की गई।
जांच में खुला पूरा नेटवर्क
मामले की जांच इंस्पेक्टर संदीप सिंह (साइबर सेल, क्राइम ब्रांच) को सौंपी गई। तकनीकी जांच में हेड कांस्टेबल अक्षय कुमार ने कई संदिग्ध बैंक खातों और यूपीआई आईडी का पता लगाया, जिनके जरिए रकम को अलग-अलग खातों में घुमाया जा रहा था। जांच के दौरान मेसर्स वृंदिकार्ट स्काईलाइन शॉपर्स प्राइवेट लिमिटेड के नाम से दर्ज एक कंपनी का खाता सामने आया, जिसके संयुक्त निदेशक अनीश सिंह और मणि सिंह हैं। इस कंपनी के नाम पर आठ बैंक खाते अलग-अलग बैंकों में खोले गए थे, जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम को छिपाने और घुमाने के लिए किया जा रहा था। लेन-देन की जांच में लेयर-1 से लेयर-4 तक फंड ट्रेल सामने आई, जिससे यह साफ हुआ कि यह एक संगठित साइबर अपराध गिरोह है।
फर्जी सिम और दस्तावेजों का इस्तेमाल
तकनीकी विश्लेषण में यह भी सामने आया कि आरोपी फर्जी सिम कार्ड और जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल कर रहे थे। दोनों आरोपी पहले भी इसी तरह के मामले में फरीदाबाद पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जा चुके हैं। पुलिस के अनुसार मामले में आगे की जांच जारी है और गिरोह से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है।