Dahi Handi 2026: भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा दही हांडी उत्सव आज यानी 5 सितंबर को मनाया जा रहा है। जन्माष्टमी के अगले दिन होने वाला यह पर्व कान्हा के बचपन की शरारतों और उनकी माखन चोरी की लीला की याद दिलाता है। इस मौके पर अलग-अलग जगहों पर गोविंदा की टोलियां उत्साह के साथ मटकी फोड़ती हैं। कई लोग मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर टंगी दही-माखन से भरी हांडी तक पहुंचते हैं। महाराष्ट्र में इस पर्व की खास रौनक देखने को मिलती है। आइए जानते हैं कि दही हांडी को जन्माष्टमी के अगले दिन मनाने की परंपरा क्यों है और इस दिन किस तरह पूजा करनी चाहिए।
दही हांडी पूजा का शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार, 5 सितंबर को वज्र योग का संयोग रहेगा। पूजा-पाठ और शुभ कार्यों के लिए दिन में अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजे से 12:50 बजे तक रहेगा। इसे दिन के प्रमुख शुभ समय में गिना जाता है। वहीं अमृत काल दोपहर 1:16 बजे से 2:45 बजे तक रहेगा। इस अवधि में भी पूजा-पाठ और धार्मिक कार्य किए जा सकते हैं।
दही हांडी के दिन कैसे करें श्रीकृष्ण की पूजा?
दही हांडी पर घर में भगवान कृष्ण या लड्डू गोपाल की पूजा की जा सकती है। इसके लिए सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा स्थल की साफ-सफाई करें और भगवान का विधिवत पूजन करें। सबसे पहले लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान कराएं। इसके बाद स्वच्छ जल से अभिषेक करके उन्हें नए वस्त्र पहनाएं। भगवान का चंदन से तिलक करें और मुकुट व बांसुरी आदि से उनका श्रृंगार करें। पूजा के दौरान लड्डू गोपाल को सुंदर झूले में विराजमान करके श्रद्धा के साथ झूला झुलाएं। इसके बाद एक छोटी मटकी में दही, मक्खन, पोहा, सूखे मेवे और कुछ सिक्के रखकर भगवान के सामने अर्पित कर सकते हैं। भोग में कान्हा को मक्खन-मिश्री, पंचमेवा और गोपालकाला चढ़ाएं। इसके बाद घी का दीपक और कपूर जलाकर श्रीकृष्ण की आरती करें। पूजा समाप्त होने पर भगवान को चढ़ाया गया प्रसाद परिवार और अन्य लोगों में बांटें।
जन्माष्टमी के अगले दिन ही क्यों मनाते हैं दही हांडी?
धार्मिक परंपराओं में जन्माष्टमी की रात भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। इसके अगले दिन उनके बाल स्वरूप की चंचल लीलाओं को उत्सव के रूप में मनाने की परंपरा है। दही हांडी भी इसी से जुड़ा पर्व है। मान्यता है कि बाल कृष्ण को दूध, दही और मक्खन बेहद प्रिय था। वह गोकुल में गोपियों के घर पहुंचकर माखन चुरा लिया करते थे। कान्हा की इन शरारतों से परेशान होकर गोपियों ने मक्खन की मटकियां ऐसी जगह लटकानी शुरू कर दीं, जहां छोटे कृष्ण आसानी से न पहुंच सकें। लेकिन कान्हा भी हार मानने वाले नहीं थे। वह अपने सखाओं को साथ लेकर आते और सभी एक-दूसरे के ऊपर चढ़कर ऊंची मटकी तक पहुंचने की कोशिश करते। इसी घटना को प्रतीकात्मक रूप से आज दही हांडी उत्सव में दोहराया जाता है। गोविंदा की टोली मानव पिरामिड बनाती है और सबसे ऊपर पहुंचने वाला सदस्य मटकी फोड़ता है। मटकी में आमतौर पर दही, मक्खन और दूसरी चीजें रखी जाती हैं। मटकी फोड़ने के बाद प्रसाद के रूप में इसे लोगों में बांटा जाता है। कुछ क्षेत्रों में इस उत्सव को गोपालकाला के नाम से भी जाना जाता है।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।