Astro Tips: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ, हवन और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद दक्षिणा देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आम धारणा है कि दक्षिणा का मतलब पंडित या पुरोहित को पैसे देना है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसका अर्थ केवल धन तक सीमित नहीं है। दक्षिणा दरअसल उस व्यक्ति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम मानी जाती है, जिसने धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराया हो। ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय के अनुसार, दक्षिणा देते समय सबसे महत्वपूर्ण चीज राशि या वस्तु की कीमत नहीं, बल्कि उसके पीछे की श्रद्धा होती है। व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के हिसाब से दक्षिणा दे सकता है।
दक्षिणा और दान में क्या फर्क है?
दान और दक्षिणा को अक्सर एक ही समझ लिया जाता है, जबकि दोनों की भावना अलग मानी गई है। किसी जरूरतमंद की सहायता के उद्देश्य से धन, भोजन या वस्तु देना दान कहलाता है। वहीं, पूजा या धार्मिक कर्मकांड कराने वाले गुरु, पुरोहित अथवा धार्मिक सेवक को सम्मान स्वरूप दी जाने वाली वस्तु या धनराशि को दक्षिणा कहा जाता है। इसलिए दक्षिणा में सबसे ज्यादा महत्व श्रद्धा, सम्मान और आभार का माना जाता है, न कि दिखावे या बड़ी रकम का।
अपनी क्षमता के अनुसार दे सकते हैं धन
पूजा के बाद दक्षिणा के रूप में रुपये देना सबसे प्रचलित परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में धन को मां लक्ष्मी से जोड़कर देखा जाता है। इसी कारण अपनी सामर्थ्य के मुताबिक दी गई धनराशि को शुभ माना जाता है। दक्षिणा देने के लिए किसी निश्चित रकम का होना जरूरी नहीं माना जाता। छोटी राशि भी यदि श्रद्धा और सम्मान के साथ दी जाए तो उसका धार्मिक महत्व माना जाता है।
तांबे और पीतल की वस्तुएं भी दे सकते हैं
दक्षिणा में उपयोगी धातु की वस्तुएं देना भी एक परंपरा रही है। पंडित कौशल पांडेय के मुताबिक, तांबे या पीतल से बने लोटे, थाली, कटोरी और अन्य उपयोगी सामान दक्षिणा के तौर पर दिए जा सकते हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं में तांबे और पीतल का संबंध सूर्य तथा गुरु ग्रह से जोड़ा जाता है। इसलिए इन धातुओं से बनी वस्तुओं को धार्मिक अवसरों पर देना शुभ माना जाता है।
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फल-मिठाई से लेकर पीले वस्त्र तक
पूजा-पाठ के बाद दक्षिणा में फल और मिठाई देना भी शुभ माना जाता है। इसके अलावा पीले रंग के कपड़े को भी धार्मिक दृष्टि से विशेष माना गया है। दक्षिणा के साथ पीला वस्त्र या कलावा देना भी परंपरा में शामिल है। मान्यता है कि इस तरह श्रद्धा के साथ दक्षिणा देने से गुरु का आशीर्वाद प्राप्त होता है और धार्मिक अनुष्ठान के प्रति सम्मान की भावना बनी रहती है।
दक्षिणा में भावना सबसे महत्वपूर्ण
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दक्षिणा का मूल्य उसकी कीमत से नहीं, बल्कि देने वाले व्यक्ति की भावना से तय होता है। इसलिए पूजा के बाद दक्षिणा देते समय सामर्थ्य के अनुरूप कोई धनराशि या उपयोगी वस्तु श्रद्धापूर्वक देना ही इसका मूल भाव माना जाता है।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।