मध्यप्रदेश की राजनीति में उस वक्त हलचल तेज हो गई जब दतिया से कांग्रेस विधायक Rajendra Bharti की सदस्यता खत्म कर दी गई। 27 साल पुराने एफडी घोटाले में कोर्ट से 3 साल की सजा मिलने के बाद यह कार्रवाई हुई। देर रात विधानसभा सचिवालय खुलने और तत्काल आदेश जारी होने से मामला और गर्मा गया है। विपक्ष ने इसे राजनीतिक साजिश करार देते हुए कड़ी आपत्ति जताई है।
27 साल पुराना घोटाला, अब मिला सजा का फैसला
यह मामला साल 1998 का है, जब एक सहकारी बैंक में 10 लाख रुपए की एफडी कराई गई थी। आरोप है कि दस्तावेजों में हेरफेर कर एफडी की अवधि बढ़ाई गई और गलत तरीके से ब्याज निकाला गया। कोर्ट ने इस मामले में Rajendra Bharti को दोषी मानते हुए अलग-अलग धाराओं में 3-3 साल और 2 साल की सजा सुनाई।
सजा के साथ गई सदस्यता, देर रात खुला सचिवालय
दो साल से अधिक सजा मिलने के बाद नियमों के तहत विधायक की सदस्यता समाप्त कर दी गई। खास बात यह रही कि रात करीब 10:30 बजे विधानसभा सचिवालय खोला गया और कुछ ही देर में सीट रिक्त घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। इसके बाद संबंधित पत्र चुनाव आयोग को भेजने की कार्रवाई भी की गई।
रात में पहुंचे कांग्रेस नेता, अफसरों से तीखी बहस
घटनाक्रम की जानकारी मिलते ही कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष Jitu Patwari और पूर्व विधायक PC Sharma देर रात विधानसभा पहुंचे। दोनों नेताओं ने प्रमुख सचिव Arvind Sharma से मुलाकात कर सवाल उठाए कि इतनी रात में कार्रवाई क्यों की गई। हालांकि अफसरों ने इसे कानूनी प्रक्रिया बताते हुए कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से गर्माया माहौल
कांग्रेस ने इस कार्रवाई को राजनीतिक दबाव में उठाया गया कदम बताया है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि सरकार के इशारे पर जल्दबाजी में यह फैसला लिया गया। वहीं सत्ता पक्ष की ओर से इसे पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया निर्णय बताया जा रहा है। इस मुद्दे ने प्रदेश की सियासत को एक बार फिर गरमा दिया है।
क्या कहता है कानून: सजा के साथ अयोग्यता तय
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के अनुसार, अगर किसी जनप्रतिनिधि को दो साल या उससे अधिक की सजा होती है, तो उसकी सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है। साथ ही वह दोषसिद्धि की तारीख से चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाता है। हालांकि, अपील के लिए कुछ समय दिया जाता है, जिसके दौरान कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।