दिल्ली के सिविल लाइंस इलाके में स्थित 33, शामनाथ मार्ग का पुराना बंगला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। दशकों से ‘मनहूस बंगला’ के नाम से मशहूर इस जगह को अब गिराने की तैयारी चल रही है। सरकार यहां राज्य आपदा प्रबंधन का नया कार्यालय बनाने पर विचार कर रही है, जिससे इस खाली पड़े परिसर का उपयोग हो सके।
ब्रिटिश काल से जुड़ा इतिहास
करीब 1920 के आसपास बने इस बंगले का इतिहास काफी पुराना है। लगभग 5500 वर्गमीटर में फैले इस परिसर में चार बेडरूम, बड़े ड्राइंग रूम, कॉन्फ्रेंस हॉल, लॉन और स्टाफ क्वार्टर जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। हालांकि इसकी ऊंची छतों के कारण आवाज गूंजने की समस्या भी बताई जाती है, जिससे लोग यहां असहज महसूस करते हैं।
पहले मुख्यमंत्री से शुरू हुआ डर
इस बंगले की ‘मनहूस’ छवि की शुरुआत 1952 में हुई, जब दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश यहां रहने लगे। लेकिन 1955 में उन्हें कार्यकाल पूरा होने से पहले ही इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद यह धारणा बनने लगी कि इस बंगले में रहने वालों का कार्यकाल पूरा नहीं होता।
लगातार जुड़ती गईं घटनाएं
इसके बाद मदन लाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा भी इस बंगले से जुड़े, लेकिन दोनों ही अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। वहीं उद्योग मंत्री दीपचंद बंधु की बीमारी और मृत्यु की घटना ने इस डर को और मजबूत कर दिया।
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नेताओं ने रहने से किया परहेज
पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी इस बंगले में रहने से साफ इनकार कर दिया था। कई अन्य अधिकारियों ने भी यहां रहना या काम करना पसंद नहीं किया। आम आदमी पार्टी सरकार के समय इसे कार्यालय बनाया गया, लेकिन वहां भी कार्यकाल विवादों में घिरा रहा।
अब खत्म हो सकती है ‘मनहूस’ कहानी
अब सरकार इस बंगले को गिराकर नई इमारत बनाने की योजना बना रही है। अगर ऐसा होता है, तो वर्षों से चली आ रही ‘मनहूस बंगला’ की कहानी भी खत्म हो सकती है। यह मामला बताता है कि कैसे राजनीतिक घटनाएं और संयोग मिलकर समय के साथ एक मिथक का रूप ले लेते हैं।