देश की राजधानी दिल्ली इस समय भीषण गर्मी की मार झेल रही है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह गर्मी पूरे शहर को एक समान प्रभावित नहीं कर रही। कहीं जमीन का तापमान 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है तो कहीं अपेक्षाकृत राहत महसूस की जा रही है। हालिया तापमान विश्लेषण से स्पष्ट हुआ है कि शहरीकरण, हरियाली की कमी और बुनियादी सुविधाओं में असमानता ने दिल्ली को कई हिस्सों में बांट दिया है, जहां गर्मी का असर भी अलग-अलग दिखाई दे रहा है।
हीट मैप ने खोली राजधानी की सच्चाई
तापमान आधारित विश्लेषण में सामने आया है कि मई के दौरान दिल्ली का औसत भूमि सतह तापमान 48.46 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। शहर के अधिकांश वार्ड 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान की चपेट में रहे। उत्तर-पश्चिम, दक्षिण-पश्चिम और पूर्वी दिल्ली के कई इलाके सबसे अधिक गर्म पाए गए, जहां जमीन की सतह का तापमान 53 से 60 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंच गया। इसके विपरीत, कुछ हरित क्षेत्रों और केंद्रीय हिस्सों में अपेक्षाकृत कम तापमान दर्ज किया गया। आंकड़े बताते हैं कि राजधानी का बड़ा हिस्सा लगातार हीट-स्ट्रेस की स्थिति से जूझ रहा है।
कंक्रीट का विस्तार बना गर्मी का बड़ा कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल मौसमीय बदलाव का परिणाम नहीं है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, कंक्रीट संरचनाओं के विस्तार, सड़कों और भवनों की बढ़ती संख्या ने गर्मी को कई गुना बढ़ा दिया है। पक्की सतहें दिनभर सूर्य की गर्मी को अवशोषित करती हैं और रात में उसे छोड़ती रहती हैं। इसके अलावा वाहनों का दबाव, औद्योगिक गतिविधियां, एयर कंडीशनर का बढ़ता उपयोग और हरियाली में कमी ने शहरी हीट आइलैंड प्रभाव को और मजबूत किया है।
गरीब और मजदूर वर्ग पर सबसे ज्यादा असर
भीषण गर्मी का सबसे गंभीर प्रभाव उन लोगों पर पड़ रहा है जो खुले में काम करने को मजबूर हैं। निर्माण मजदूर, रेहड़ी-पटरी विक्रेता, दिहाड़ी श्रमिक और अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लोग सबसे अधिक जोखिम में हैं। अत्यधिक तापमान के कारण हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के मामले बढ़ रहे हैं। वहीं लंबे समय तक काम न कर पाने के कारण उनकी आय भी प्रभावित हो रही है, जिससे आर्थिक चुनौतियां और गहरा रही हैं।
स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों पर बढ़ता दबाव
लगातार बढ़ती गर्मी स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है। अस्पतालों में गर्मी से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। बुजुर्ग, बच्चे और पहले से बीमार लोग सबसे अधिक संवेदनशील हैं। दूसरी ओर, उत्पादकता में गिरावट और बिजली की बढ़ती खपत शहर की अर्थव्यवस्था पर भी असर डाल रही है। कूलिंग की बढ़ती जरूरत बिजली आपूर्ति पर दबाव बढ़ा रही है, जिससे भविष्य में ऊर्जा संकट की आशंका भी गहरा सकती है।
राहत के लिए दीर्घकालिक योजना जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल चेतावनी जारी करना पर्याप्त नहीं होगा। शहर में अधिक पेड़ लगाने, सार्वजनिक कूलिंग सेंटर विकसित करने, निर्माण स्थलों पर पानी और छाया की व्यवस्था सुनिश्चित करने तथा गर्मी प्रतिरोधी शहरी नियोजन को प्राथमिकता देने की जरूरत है। छतों पर परावर्तक सामग्री और ग्रीन बिल्डिंग मानकों को बढ़ावा देकर भी तापमान के प्रभाव को कम किया जा सकता है। यदि समय रहते व्यापक और समावेशी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में गर्मी का संकट और गंभीर रूप ले सकता है।