Delhi High Court Detention Case : दिल्ली हाईकोर्ट में सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत बढ़ाने से जुड़े आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने बार-बार सवाल उठाया कि जब कानून में अपील और दूसरे विकल्प मौजूद हैं, तो याचिकाकर्ता सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट क्यों आए हैं। इसके बाद याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील अभिक चिमनी ने याचिका वापस लेने का फैसला किया। मामला 14 और 19 अक्टूबर को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की ओर से पारित आदेशों से जुड़ा है।
अपील के विकल्प पर कोर्ट के सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूछा कि जब मजिस्ट्रेट के आदेश को जिला मजिस्ट्रेट या अपीलीय अदालत में चुनौती देने का विकल्प मौजूद है, तो उसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत वह मुख्य रूप से यह देख सकती है कि तय कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं। तथ्यों और सबूतों का दोबारा आकलन करना अपीलीय अदालत का काम है। वकील ने दलील दी कि हिरासत बढ़ाने और जमानतदारों को खारिज करने के आदेश मनमाने हैं, लेकिन अदालत ने वैकल्पिक कानूनी उपायों पर जोर दिया।
बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन का मामला
याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि उनके मुवक्किलों को बॉन्ड भरने के लिए मजबूर किया गया और 19 अक्टूबर का आदेश उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना पारित हुआ। उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 135 का हवाला देते हुए कहा कि शांति भंग होने की आशंका के लिए ठोस आधार होना जरूरी है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि पहले दिए गए बॉन्ड के उल्लंघन की बात सामने आई है और मजिस्ट्रेट ने अपने आकलन के आधार पर फैसला लिया। अदालत ने सवाल किया कि क्या इस स्तर पर मजिस्ट्रेट के आकलन की समीक्षा करना उचित होगा।
जमानतदारों को बार-बार खारिज करने पर बहस
सुनवाई के दौरान वकील अभिक चिमनी ने दावा किया कि याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश जमानतदारों को कई बार खारिज किया गया। उन्होंने आशंका जताई कि याचिका वापस लेने के बाद यदि मजिस्ट्रेट की अदालत फिर जमानतदारों को अस्वीकार करती है, तो उन्हें दोबारा हाईकोर्ट आना पड़ सकता है। इस पर अदालत ने कहा कि जमानतदारों को खारिज करने के फैसले को अलग से चुनौती देने का विकल्प मौजूद है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब नए जमानतदार पेश किए जा सकते हैं, तो पहले उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा।
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प्रदर्शन और बैरिकेड तोड़ने पर भी सवाल
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ने से जुड़े घटनाक्रम पर भी सवाल किए। अदालत ने कहा कि बैरिकेड सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगाए जाते हैं। उन्हें तोड़कर आगे बढ़ने से हालात बिगड़ने और दूसरे लोगों के भी वहां पहुंचने का खतरा हो सकता है। अदालत ने 10 और 13 अक्टूबर की घटनाओं का जिक्र करते हुए पहले दिए गए बॉन्ड के कथित उल्लंघन और शांति भंग होने की आशंका पर विचार किया। कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या याचिकाकर्ताओं को संबंधित मामले में दी गई कानूनी सुरक्षा का लाभ मिल सकता है।
अब आगे किस रास्ते से मिलेगी राहत?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपायों पर विचार करना चाहिए। अदालत ने यह भी पूछा कि जब स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत में सुनवाई तय थी, तो हाईकोर्ट में तत्काल याचिका दाखिल करने की जरूरत क्यों पड़ी। आखिरकार याचिकाकर्ताओं ने अपनी अर्जी वापस ले ली। अब हिरासत और जमानतदारों से जुड़े सवालों पर आगे की कार्रवाई संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत होगी। इस घटनाक्रम से फिलहाल इतना स्पष्ट है कि हाईकोर्ट ने मामले में सीधे हस्तक्षेप करने से पहले उपलब्ध वैकल्पिक उपायों के इस्तेमाल पर जोर दिया।