दिल्ली का सियासी तापमान इस वक्त मौसम से ज्यादा गर्म हुआ पड़ा है, क्योंकि MCD उपचुनाव के लिए बीजेपी और AAP के बाद अब कांग्रेस ने भी अपने उम्मीदवार मैदान में उतार दिए हैं. यानी ये उपचुनाव अब सीधा आर-पार का नहीं, बल्कि जबरदस्त त्रिकोणीय मुकाबला बन चुका है. खबरों की मानें तो 30 नवंबर को होने वाले इस चुनाव में 12 वार्ड दांव पर हैं, और तीनों बड़ी पार्टियां पूरी ताकत झोंक चुकी हैं. आम आदमी पार्टी ने दक्षिणपुरी से राम स्वरूप, संगम विहार-ए से अनुज शर्मा, ग्रेटर कैलाश से ईष्णा गुप्ता जैसे उम्मीदवार उतारकर दावा किया कि ये लोग दिल्ली की साफ-सुथरी राजनीति को आगे बढ़ाएंगे. उधर बीजेपी ने भी इस मुकाबले को हल्के में न लेते हुए अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं.
कांग्रेस के उतरने से बदला माहौल !
अब कांग्रेस के मैदान में उतरते ही मुकाबला पूरी तरह बदल गया है. कांग्रेस ने अपनी लिस्ट में सभी सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व देते हुए उम्मीदवार चुने हैं जिसमें ओबीसी, एससी, अल्पसंख्यक और महिला उम्मीदवार प्रमुख हैं. मुंडका से ओबीसी वर्ग के मुकेश, शालीमार बाग-बी से एससी सीट पर सरिता कुमारी, चांदनी चौक से अल्पसंख्यक उम्मीदवार अजय जैन और द्वारका-बी से सुमिता मलिक जैसे नाम उतारकर कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि ये उपचुनाव वह पूरी गंभीरता से लड़ रही है.
कांग्रेस-BJP और AAP में टक्कर !
12 में 12 वार्डों पर कांग्रेस ने रणनीति बनाकर नए चेहरे उतारे हैं ताकि बीजेपी और AAP दोनों को चुनौती दी जा सके. AAP कह रही है कि उनकी लिस्ट जनता और पारदर्शी शासन का प्रतिनिधित्व करती है. कांग्रेस का दावा है कि उसके उम्मीदवार जमीन से जुड़े और स्थानीय हितों की आवाज उठाने वाले हैं. वहीं बीजेपी कोशिश कर रही है कि हर वार्ड में AAP और कांग्रेस की जोड़ीतोड़ से ऊपर उठकर खुद को एक मजबूत विकल्प दिखा सके. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो उपचुनाव भले छोटे हों, लेकिन दिल्ली की राजनीति के लिए ये बेहद अहम संकेत देने वाले होंगे. 12 वार्डों में लगभग हर वर्ग के मतदाता हैं, और तीनों पार्टियों की रणनीति इन्हीं वोट बैंक को साधने पर केंद्रित है.
30 नवंबर को होने वाले मतदान पर नजरें
अब 30 नवंबर को मतदान होगा और नतीजे बताएंगे कि दिल्ली की जनता किसका साथ देती है. क्या AAP अपनी पकड़ बनाए रखेगी? क्या बीजेपी कमबैक करेगी? या कांग्रेस अचानक वापसी कर चौका मारेगी? फिलहाल एक बात तय है दिल्ली का MCD उपचुनाव अब सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि तीन प्रमुख पार्टियों की प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है. अब आगे क्या होगा ये देखने वाली बात होगी