राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले डेढ़ महीने से AQI लगातार 'खराब' श्रेणी में दर्ज हो रहा है। इसी बीच सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट ने 59 दिनों की स्टडी के बाद एक रिपोर्ट जारी की है, जिसने साफ कहा कि दिल्ली की हवा में जहर घोलने का सबसे बड़ा कारण सड़क पर दौड़ते वाहनों का धुआं है। रिपोर्ट के मुताबिक शुरुआती सर्दी में NO₂ और CO जैसी जहरीली गैसें खतरे के स्तर से ऊपर पहुंच गई हैं, जिनके पीछे सबसे बड़ी वजह ट्रैफिक है।
ट्रैफिक का ‘धुआं चक्र’, सर्दियों में और घातक
CSE की रिपोर्ट बताती है कि सर्दियों में वायुमंडल की 'बाउंड्री लेयर' काफी नीचे आ जाती है, जिससे हवा का फैलाव रुक जाता है। ऐसे में वाहनों से निकलने वाला धुआं ऊपर नहीं जा पाता और सतह पर ही जमा हो जाता है। यही कारण है कि नवंबर–दिसंबर में प्रदूषण का स्तर अचानक बढ़ जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार दिल्ली की हवा में मौजूद PM2.5, NO₂ और कार्बन मोनोऑक्साइड का सबसे बड़ा सोर्स सिर्फ ट्रैफिक है। दो बार सुबह ऑफिस ट्रैफिक और शाम की भीड़ इन दोनों समय प्रदूषण का स्तर तेजी से ऊपर जाता है, जो सीधे-सीधे वाहनों के उत्सर्जन से जुड़ा है।
ये भी पढ़ें : शेयर बाजार में हड़कंप, Sensex-Nifty फिर धड़ाम, क्या अब आएगी बड़ी गिरावट?
NO₂ और CO में रिकॉर्ड उछाल
CSE के अध्ययन में यह भी सामने आया कि सुबह 7-10 बजे और शाम 6-9 बजे PM2.5 का पिक NO₂ के पिक से मेल खाता है। यह पैटर्न बताता है कि ट्रैफिक का प्रेसर सीधे हवा की गुणवत्ता को खराब करता है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में NO₂ में लगातार तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके अलावा CO यानी कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर भी गंभीर रहा। कई स्टेशनों ने 8 घंटे की CO सीमा को लगातार कई दिनों तक पार किया, जो बेहद चिंताजनक है।
दिल्ली के कई इलाकों में बिगड़े हालात
CSE की रिपोर्ट के अनुसार 59 दिनों की मॉनीटरिंग में राजधानी के कई इलाकों में हवा बेहद खराब पाई गई। द्वारका सेक्टर-8 में 55 दिनों तक CO स्तर मानक से ऊपर दर्ज हुआ, जबकि जहांगीरपुरी और नॉर्थ कैंपस के मॉनीटरिंग स्टेशन 50-50 दिनों तक सीमा से ऊपर मिले। कुल मिलाकर दिल्ली के 40 से ज्यादा स्टेशनों ने लगातार खतरनाक ट्रेंड दिखाया। यह साफ करता है कि अगर ट्रैफिक प्रदूषण पर अब भी कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो दिल्ली की हवा और सांस दोनों मुश्किल में पड़ सकती हैं।