सोमवार की शाम दिल्ली के लाल किले के पास हुए कार धमाके ने पूरे देश को हिला दिया. इस विस्फोट में करीब 10 लोगों की मौत हो गई और करीब 25 लोग घायल हुए. धमाका इतना जोरदार था कि आसपास की कई गाड़ियों में आग लग गई. पुलिस ने इलाके को पूरी तरह सील कर दिया है. सूत्रों के मुताबिक, यह हमला बीते 14 सालों में दिल्ली पर हुआ सबसे बड़ा हमला माना जा रहा है. हालांकि अभी इस हमले के आतंकी होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. इससे पहले 2008 में ऐसे ही सिलसिलेवार धमाके हुए थे, जिनमें 30 लोगों की जान गई थी.
दिल्ली के आतंकी हमलों का इतिहास
राजधानी दिल्ली सिर्फ सत्ता का केंद्र नहीं बल्कि देश की सुरक्षा और शांति का प्रतीक भी मानी जाती है. लेकिन बीते चार दशकों में इस शहर को कई बार आतंकी हमलों का दर्द झेलना पड़ा है. 1985 में ट्रांजिस्टर बम धमाकों में 49 लोग मारे गए, जबकि 1996 में लाजपत नगर में हुए विस्फोट ने 13 ज़िंदगियाँ छीन लीं. 2005 में दिवाली से ठीक पहले सरोजिनी नगर, पहाड़गंज और गोविंदपुरी में हुए तीन धमाकों में 62 लोगों की मौत और 210 से ज़्यादा लोग घायल हुए. तीन साल बाद, 13 सितंबर 2008 को इंडियन मुजाहिदीन ने करोल बाग, कनॉट प्लेस और ग्रेटर कैलाश में पांच धमाकों की जिम्मेदारी ली, जिनमें 30 लोगों की जान गई.
2011 में हाईकोर्ट के बाहर धमाका, बची राजधानी
7 सितंबर 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर भीषण धमाका हुआ था. बम एक ब्रिफकेस में रखा गया था. इस विस्फोट में कई लोग घायल हुए, लेकिन बड़ी जनहानि नहीं हुई. इसके बाद दिल्ली पुलिस, एनआईए और सुरक्षा एजेंसियों ने राजधानी के बाजारों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में सीसीटीवी नेटवर्क और क्विक रिस्पॉन्स टीमों की तैनाती बढ़ाई.
क्यों निशाने पर रहती है दिल्ली?-
विशेषज्ञों के मुताबिक, दिल्ली आतंकियों के लिए हमेशा एक बड़ा और आसान लक्ष्य रही है. प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद भवन, विदेशी दूतावासों की मौजूदगी और त्योहारों के दौरान बढ़ी भीड़ आतंकियों को मौका देती है. रक्षा अध्ययन संस्थान की रिपोर्ट बताती है कि 1997 से अब तक दिल्ली में 26 बड़े धमाके हो चुके हैं, जिनमें 92 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है. लाल किले के पास हुआ यह हालिया विस्फोट फिर से यह सवाल खड़ा करता है क्या देश की राजधानी आज भी पूरी तरह सुरक्षित है?